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Wednesday, May 13, 2015

➽ मैं अपनी आस्थाओं में खुश हूँ और आप अपनी नास्तिकता में खुश रहो… लेकिन चरस ना बनो…

आज एक और तथाकथित प्रगतिशील विचारक चिंतक बहुरूपिये साधु अजीत साहनी उर्फ़ स्वामी अजीतानंद/फ़ज़ीतानंद ने मुझे ब्लॉक कर दिया… इनके पास फेसबुक पर दो कार्य हैं, पहला नास्तिक बनकर दूसरों की धार्मिक आस्थाओं का ऊलजुलूल उपहास उड़ाना और दूसरा अपनी पत्नी के साथ तरह-तरह के पोज़ फेसबुक पर पोस्ट करना… मेरा कुसूर सिर्फ़ इतना है कि उनकी कल की एक ऐसी ही हनुमान जी और क़ुरान की खिल्ली उड़ाऊ पोस्ट पर मैंने उनसे कुछ सवाल उन्हीं के लहजे में पूछ लिए… और बस मुझे जवाब देने की बजाय उन्होंने बेहयाई से उल्टा सीधा कॉमेंट करते हुए ब्लॉक कर दिया… 

तमाम छोटी-छोटी आस्थाओं के तर्क की कसौटी पर प्रमाण मांगने वाले प्रगतिशील नास्तिक अजीत साहनी से मैंने बस दो सवाल पूछे -- पहला कि कट्टर नास्तिक होकर भी वह सिख धर्म के प्रतीक चिन्ह केश-पगड़ी-दाढ़ी कैसे और क्यों धारण करते हैं…??? जबकि तमाम आधुनिक आस्थावान सिख भी केश-पगड़ी-दाढ़ी नहीं रखते… जबकि अधिकांश आस्थावान हिन्दू चुटिया नहीं रखते, बड़ी संख्या में आस्थावान मुस्लिम दाढ़ी नहीं रखते… आखिर एक नास्तिक द्वारा आज सन 2015 में तीन सौ साल पुराने धार्मिक प्रतीकों को मान्यता किस वजह से है.…?

और दूसरा सवाल यह कि बहुरुपिया साधु अजीत साहनी की तमाम फोटुओं में दिखने वाली उनकी माननीया पत्नी जी सिन्दूर-बिंदी वगैरह सुहाग के प्रतीकों का धारण नास्तिकता के किन नियमों के तहत करती हैं…??? प्रगतिशील नास्तिक की दृष्टि में तो सिन्दूर, बिछिया, आलता, बिंदी, नथ, बाली, मंगलसूत्र वगैरह नारी दासता के प्रतीक चिन्ह हैं… तो क्या एक प्रगतिशील नास्तिक स्वयं अपनी पत्नी को ही नारी दासता से मुक्ति नहीं दिला पाया… दरअसल इन धार्मिक प्रतीकों से तो मरहूम हरकिसन सिंह सुरजीत जैसे प्रगतिशील नास्तिक भी अपने को अलग नहीं कर पाये थे… 

दीगरां नसीहत और खुद मियाँ फ़ज़ीहत…  और बस उस बहुरूपिये नास्तिक के अंदर के हिटलर, मार्क्स, एंजेल्स, स्टॉलिन, लेनिन, माओ वगैरह सारे तानाशाह जिन्न जाग उठे और यह बेचारा आस्तिक सदा के लिए ब्लॉक कर दिया गया… थू है ऐसे समाज में ज़हर फैलाने वाले बुद्धिजीवियों पर… ईश्वर है या नहीं पता नहीं, लेकिन मेरी आस्थाएं मुझे मानसिक सम्बल और सुकून देती हैं… धर्म और आस्था मेरा निजी मामला है जिस पर मैं चौराहे पर बहस नहीं कर सकता… हो सकता है कि मेरी छोटी-छोटी तमाम आस्थाओं के कोई तर्क ना हों लेकिन किसी को उनकी खिल्ली उड़ाने का अधिकार भी तो नहीं है… मैं अपनी आस्थाओं में खुश हूँ और आप अपनी नास्तिकता में खुश रहो… लेकिन चरस ना बनो… #संतासुर 

#संतासुर

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