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Friday, May 1, 2015

➽ मज़बूर मज़दूर बनाम मज़बूत मज़दूर

"हैप्पी लेबर डे"… "अंतराष्ट्रीय मज़दूर दिवस पर ढेर सारा बधाई…" लेकिन घूम-घूमकर मज़दूरों पर भाषण झाड़ रहे नेताओं में से शायद ही किसी ने अपने घरेलू नौकर, महरी, माली, ड्राइवर, मज़दूर आदि को मई दिवस मनाने के लिए छुट्टी दी हो…  "दुनिया के मेहनतकशों एक हो"… अरे ससुरों पहले एक देश या एक प्रदेश में या एक शहर में या एक इंडस्ट्री में या फिर एक विभाग में ही एक हो जाओ… उसके बाद दुनिया में ताल ठोकना… एक सेक्शन में तो एक रहते नहीं, नारा दुनिया के मेहनतकशों का लगेगा… राजनीति से कहीं ज्यादा बैरभाव, उठापटक, चालबाजियां, कट्टरवाद और खेमेबाजी तो ट्रेड यूनियनों में व्याप्त है… तमाम ट्रेड यूनियनों के नेता किसी दूसरी यूनियन के नेताओं के साथ एक मंच पर नहीं बैठ सकते… 

कठमुल्लापन, कट्टरवाद और श्रेष्ठता का दम्भ तमाम ट्रेड यूनियन नेताओं में धार्मिक नेताओं से भी कहीं ज्यादा है… ब्यूरोक्रेसी और अरिस्टोक्रेसी में तमाम ट्रेड यूनियन लीडर बड़े से बड़े नौकरशाह को भी मात देते दिखेंगे… अधिकांश वामपंथी राजनीतिक दल और उनकी अधिकांश ट्रेड यूनियनें आत्मुग्धता और श्रेष्ठता की ग्रंथि से पीड़ित हैं और उनके बहत्तर चूल्हे किसी पोंगापंथी ब्राह्मणवाद को भी पीछे छोड़ते हैं… 

"हम मेहनतकश जब दुनिया से अपना हिस्सा मांगेंगे, एक खेत नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे"… अमां मियाँ, मज़दूर भूमाफिया से अपनी ज़मीन का टुकड़ा तो बचा नहीं पा रहा है… उसके खेतों पर सरकार की नज़र है… आप हारमोनियम की तान पर मांगते रहो दुनिया-ब्रह्माण्ड अपने गानों में… शाम को दो पैग के बाद तो फटीचर मज़दूर भी चन्द्रमा को अपनी रियासत में मानने लगता है…

कुल मिलकर पहली मई संगठित मज़दूरों के प्रचलित कर्मकाण्ड का हिस्सा बनकर रह गया है… बल्कि सच कहें तो वामपंथी ट्रेडयूनियनें ही इस कर्मकांड को किसी तरह निर्वाह करती दिखती हैं… वरना नई पीढ़ी का युवा तो पांच हज़ार रुपये महीने पगार की वोडाफोन या बिगबाज़ार की नौकरी करके भी अपने को मज़दूर की बजाय सेल्स एक्जीक्यूटिव बताता है… मज़दूर कहने पर तो शायद बुरा मान जाए… वास्तविक मज़दूरों को तो शायद पता भी नहीं होगा कि आज मई दिवस है और क्यों है… वैसे भी लुप्तप्राय चीज़ों को संरक्षित करने के लिए ही उनका दिवस मनाया जाता है… #‎संतासुर


#‎संतासुर

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