मीडिया मंथरा बता रहा है कि प्रख्यात समाजसेवी NGO आईएसआईएस अब भारत में अपनी सामाजिक सेवाओं का विस्तार करना चाहता है... खबर से विचलित हमारे मोहल्ले के घसीटे भारती, उजागर यादव, लालता चौबे, हरखू ठाकुर, ज़हूर घोसी वग़ैरह को हमने बेफ़िकर होकर अपने-अपने दलों का वोटर बने रहने की तसल्ली दी... उन बेचारों को समझाया कि भइय्या, ये इण्डिया है इण्डिया... यहाँ से तो हमने हमेशा सूर्योदय रखने वाली ब्रिटिश हुकूमत को भी अपने अनशन, सविनय अवज्ञा, करो वा मरो, जेल भरो आंदोलन जैसे फ़ोकट के स्वदेशी अमोघ हथियारों से मार भगाया... हमारे पास तो पांच-पांच मीटर तक पान-मसाला की पीक थूंक सकने वाले योद्धा हैं... 125 करोड़ लोग तो अगर एकसाथ सिर्फ़ जोर-जोर से तालियाँ बजाकर ठहाके लगा देंगे या कब्ज़ियत वाली गैस छोड़ देंगे, तो आईएसआईएस के स्वयंसेवक सीधे इराक़ भागकर ही दम लेंगे... और फिर हमारे पास आल्हा जैसा युद्ध-गीत है, जिसके गा देने भर से बेचारे ज़िहादी स्वयंसेवक दहल जायेंगें...
वैसे विकीलीक्स की ख़ुफ़िया खबर है कि दुनिया भर की महाशक्तियों को चुनौती देने वाला रुस्तमे-तेल अबू बकर अल बग़दादी भारत के भीषणतम "बकर-बकर बयान-बम" से थर्राता है... भारत में आईएसआईएस की सक्रिय गतिविधियाँ अब तक ना बढ़ाने के पीछे बग़दादी जी का यही भय मुख्य कारण माना जाता है... समाजसेवी बग़दादी जी जानते हैं कि उनके NGO आईएसआईएस द्वारा भारत में फ़्रांस जैसी कोई आतिशबाज़ी करने पर जिस तरह से कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, राजद, वामपंथी वगैरह सेक्युलर-कम्युनल दलों के तरह-तरह के भीषण "बकर-बकर बयान-बम", "भीषण-बहस-बम", "निंदा-बम" वगैरह भीषण वातावरण-संहारक बम फटने लगेंगे... इन अति विध्वंशक "बकर-बकर बयान-बमों" से बग़दादी को स्वयं और अपने ज़िहादी समाजसेवियों के पाग़ल हो जाने का भय है... किसी आतंकवादी घटना के बाद लल्लू, पप्पू, दिग्गी, सलमू, अज़्ज़ू, सक्षू, नत्थू वगैरह सैकड़ों भीषण-भाषण-भूषण जिस तरह कांव-कांव करके एक दूसरे पर टूट पड़ेंगे... बस यही सब सोचकर ही बेचारे समाजसेवी बग़दादी जी कलेजा काँप जाता है... और वह भारत के इन लोकतांत्रिक मच्छरों के लाइलाज मलेरिया से जान बचाना चाहता है...
दुश्मन जो हमारा होता है, हमें जान से प्यारा होता है ,
करने की नहीं चिंता हमको, बहसों से गुजारा होता है।... #संतासुर
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