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Friday, December 4, 2015

➽ दुश्मन जो हमारा होता है, हमें जान से प्यारा होता है...

मीडिया मंथरा बता रहा है कि प्रख्यात समाजसेवी NGO आईएसआईएस अब भारत में अपनी सामाजिक सेवाओं का विस्तार करना चाहता है... खबर से विचलित हमारे मोहल्ले के घसीटे भारती, उजागर यादव, लालता चौबे, हरखू ठाकुर, ज़हूर घोसी वग़ैरह को हमने बेफ़िकर होकर अपने-अपने दलों का वोटर बने रहने की तसल्ली दी... उन बेचारों को समझाया कि भइय्या, ये इण्डिया है इण्डिया... यहाँ से तो हमने हमेशा सूर्योदय रखने वाली ब्रिटिश हुकूमत को भी अपने अनशन, सविनय अवज्ञा, करो वा मरो, जेल भरो आंदोलन जैसे फ़ोकट के स्वदेशी अमोघ हथियारों से मार भगाया... हमारे पास तो पांच-पांच मीटर तक पान-मसाला की पीक थूंक सकने वाले योद्धा हैं... 125 करोड़ लोग तो अगर एकसाथ सिर्फ़ जोर-जोर से तालियाँ बजाकर ठहाके लगा देंगे या कब्ज़ियत वाली गैस छोड़ देंगे, तो आईएसआईएस के स्वयंसेवक सीधे इराक़ भागकर ही दम लेंगे... और फिर हमारे पास आल्हा जैसा युद्ध-गीत है, जिसके गा देने भर से बेचारे ज़िहादी स्वयंसेवक दहल जायेंगें...

वैसे विकीलीक्स की ख़ुफ़िया खबर है कि दुनिया भर की महाशक्तियों को चुनौती देने वाला रुस्तमे-तेल अबू बकर अल बग़दादी भारत के भीषणतम "बकर-बकर बयान-बम" से थर्राता है... भारत में आईएसआईएस की सक्रिय गतिविधियाँ अब तक ना बढ़ाने के पीछे बग़दादी जी का यही भय मुख्य कारण माना जाता है... समाजसेवी बग़दादी जी जानते हैं कि उनके NGO आईएसआईएस द्वारा भारत में फ़्रांस जैसी कोई आतिशबाज़ी करने पर जिस तरह से कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, राजद, वामपंथी वगैरह सेक्युलर-कम्युनल दलों के तरह-तरह के भीषण "बकर-बकर बयान-बम", "भीषण-बहस-बम", "निंदा-बम" वगैरह भीषण वातावरण-संहारक बम फटने लगेंगे... इन अति विध्वंशक "बकर-बकर बयान-बमों" से बग़दादी को स्वयं और अपने ज़िहादी समाजसेवियों के पाग़ल हो जाने का भय है... किसी आतंकवादी घटना के बाद लल्लू, पप्पू, दिग्गी, सलमू, अज़्ज़ू, सक्षू, नत्थू वगैरह सैकड़ों भीषण-भाषण-भूषण जिस तरह कांव-कांव करके एक दूसरे पर टूट पड़ेंगे... बस यही सब सोचकर ही बेचारे समाजसेवी बग़दादी जी कलेजा काँप जाता है... और वह भारत के इन लोकतांत्रिक मच्छरों के लाइलाज मलेरिया से जान बचाना चाहता है...

दुश्मन जो हमारा होता है, हमें जान से प्यारा होता है ,
करने की नहीं चिंता हमको, बहसों से गुजारा होता है।... #‎संतासुर

#‎संतासुर‬

Thursday, December 3, 2015

➽ जाति ही पूछो साधु की, पूछो कभी ना ज्ञान...

अरे शैलजा माई, बेहतर होता कि संसद जैसी सर्वोच्च संस्था में आप विगत फरवरी 2013 में किसी मंदिर में आप जैसे संसदीय आभिजात्य की जाति पूछ लेने जैसा निजी और कम-गंभीर मुद्दा उठाने की बजाय तमिलनाडु में बाढ़ से तिल-तिल कर मर रहे निरीह इंसानों का मुद्दा उठातीं... वैसे, प्रचलित नियमानुसार किसी भी पूजा-कर्मकाण्ड के संकल्प-पाठ में यजमान का नाम तथा गोत्र पूछकर ही उसके नाम से संकल्प लिया जाता है... तथापि हिन्दुस्तान के लाखों मंदिरों में से कहीं किसी मंदिर में किसी मूर्ख पुजारी ने किसी का गोत्र, जाति-धर्म पूछ लिया तो यह कोई ऐसा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है कि आप संसद में तमाम जनोपयोगी बहसें और प्रश्न छोड़कर किसी एक मंदिर के प्रबंध-तंत्र को सुधारने में देश का वक़्त बर्बाद करें... यह जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि के देश की सर्वोच्च संस्था संसद में भाग लेने और प्रश्न पूछने के अधिकार का दुरुपयोग मात्र है, वह भी संसद-सत्र का येनकेन प्रकारेण समय बर्बाद करके संसदीय कार्यवाही बाधित करने के कांग्रेसी एजेण्डे के तहत...

शैलजा जी, यहाँ तो देश के सर्वोच्च मंदिर संसद में भी 543 में से 131 सांसदों की अर्हता ही उनका जातीय प्रमाण-पत्र है... यहाँ तो देश का महान संविधान ही जाति की भावना से त्रस्त-ग्रस्त लोगों द्वारा रचित-संकलित है, और स्वयं ही जातीय भेदभावों को व्यतिक्रम में स्वरुप बदलकर जारी रखने की वैधानिकता प्रदान करता है... आज़ादी के बाद अनुसूचित जाति की श्रेणी में आने वाली जातियों की संख्या जातिवादी संविधान की कृपा से 1000 से बढ़कर अब 5000 से भी अधिक हो चुकी है... आज़ादी के बाद अनुसूचित जातियों में शामिल होने से इंकार करने वाली तमाम जातियाँ भी अब बंटती मलाई के चक्कर में अनुसूची में शामिल होने के लिए संघर्ष और मुक़दमेबाजी में मशगूल हैं... देश-दुनिया ज्यों-ज्यों आगे जा रही है, त्यों त्यों भारत में संविधानी कृपा से अधिकाधिक दलित और पिछड़े बनने की होड़ मची है... जातीय सम्मेलनों के पोस्टरों में राष्ट्रनायकों, महापुरुषों और राष्ट्रनेताओं की तस्वीरें छापकर उन्हें जातीय गौरव के रूप में स्थापित किया जा रहा है... जहाँ वोटतांत्रिक लोकतंत्र की नैय्या ही जाति-धर्म की लहरों के सहारे तैर रही हो... 

जब स्वयं सरकार और शासन द्वारा जाति-प्रमाण जारी करना वैधानिक है... जब किसी भी विभागीय भर्ती परीक्षा के फॉर्म में जाति-धर्म का उल्लेख आवश्यक है... जब नियुक्तियों और साक्षात्कार के पैनलों में जाति-धर्म के आधार पर परीक्षकों का वैधानिक चयन आवश्यक होता है... जब जाति के आधार पर ट्रेड-यूनियनों के समानांतर जाति-समूह आधारित संगठन बनाना वैधानिक हो... जब चुनावों में राजनीतिक द्वारा प्रत्याशियों का चयन चुनाव-क्षेत्र की जातीय/धार्मिक वोटर आबादी के अनुसार होता है... जब राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा-पत्रों में कतिपय जातियों-धर्मों के वोटरों को लुभाने के लिए कैसी भी घोषणा की जा सकती हो... जब सभासद, विधायक, सांसद से लेकर मंत्रियों तक की जाति का हिसाब-किताब रखा जाता हो... जब मंत्रिमण्डल में शामिल होने की अर्हता योग्यता की बजाय जाति-धर्म हो... जब देश की तमाम छोटी-बड़ी सामान्य घटनाओं-दुर्घटनाओं का आंकलन भी जाति-धर्म के चश्में से किया जा रहा हो... तो अनुशासनहीन इतने विशाल राष्ट्र में किसी व्यक्ति/संस्था द्वारा किसी स्थान पर कभी धर्म-जाति पूछ लेना कोई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय घटना कतई नहीं है...

जहाँ जाति आधारित संगठन बनाना-चलाना वैधानिक हो... जहाँ जातीय-संगठनों द्वारा आयोजित सभाओं में जातीय-गौरव का बखान करते हुए दूसरी जातियों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना राजनीति का अंग हो... जहाँ जाति का सार्वजनिक उल्लेख करना कुर्सी-सुख-वैभव दिलाता हो... जहाँ सरकार द्वारा प्रमाणित जाति-तख़्ती लगाकर घूमना सब तरह से लाभदायक हो... जहाँ किसी एक जाति की सरकार में दूसरी जातियों के ख़िलाफ़ ऐलानिया दमन और भेदभाव हो... वहाँ किसी सांसद द्वारा फरवरी 2013 में किसी मंदिर में किसी रूढ़िवादी मूर्ख द्वारा महज जाति पूछ लिए जाने को महिमामण्डित करना उसकी कुत्सित मंशा को जाहिर करता है... शैलजा जी पर इससे पूर्व भी वाल्मीकि समुदाय को जाट समुदाय के खिलाफ भड़काने के लिए 10 मार्च, 2011 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में आपराधिक मुकदमा की पिटीशन दाखिल हो चुकी है... विगत फरवरी 2013 का उक्त मुद्दा अब इतने दिनों बाद संसद में उठाने के पीछे भी सांसद महोदया का उद्देश्य समाज-सुधार नहीं अपितु जातीय गन्दगी फैलाना मात्र है... 
"जाति ही पूछो साधु की, पूछो कभी ना ज्ञान। 
जंग लगे तलवार में, मोल बिक रही म्यान।।"    #‎संतासुर‬ 

Wednesday, December 2, 2015

➽ विनाशकाले विपरीत बुद्धि...

कल लखनऊ में यकायक मौसम की भीषण असहिष्णुता से भौचक रह गया... शाम चार बजे जाड़े की रात्रि 7 बजने का नज़ारा था... भीषण आंधी-तूफ़ान के बाद ओलों की तड़तड़ाहट और फिर तेज़ बारिश... सैकड़ों पेड़ धराशाई होने से शहर की बिजली घण्टों गुल... बेईमान मौसम की इस भीषण असहिष्णुता के दौरान पूरे यूपी में तड़ित-आघात से सात लोगों ने अपना जीवन-पदक ईश्वर को वापस कर दिया... बताते हैं कि लगातार प्रदूषण बढ़ने से फ़िज़ां में नैनो-कार्बन कणों की मोटी परत बनने के कारण मौसम की अनिश्चितता आगे भी बरक़रार रहेगी... गर्मी, सर्दी, बारिश सबकुछ अनिश्चित और विचित्र मौसमी घालमेल... कानपुर जैसा शहर नैनो-कार्बन परत की अगवानी में सबसे आगे है, जिसका असर लखनऊ तक रहेगा... तमिलनाडु की जनता मौसम की असहिष्णुता से सर्वाधिक त्रस्त है जहां दो सौ लोग बाढ़ की भेंट चढ़ चुके हैं... 

दिल्ली जैसे महानगरों में भीषण प्रदूषण के कारण बच्चों-बड़ों में अस्थमा, एलर्जी, टीबी, नेत्र-विकार आदि व्याधियां तीव्र गति से बढ़ रही हैं... भविष्य में ढेरों अख़लाक़, रामभरोसे, बंता सिंह और उनकी भावी पीढ़ियां घिस-घिस कर जिएंगीं और तिल-तिल कर मरेंगीं... छोटे स्थानों से महानगरों को बेरोजगारों के पलायन गाँव और शहर दोनों का पर्यावरण बिगाड़ रहा है... अनियंत्रित आबादी से महानगरों के अनियोजित यातायात में भीषण वृद्धि भी प्रदूषण बढ़ाने के साथ ही रोज़ हज़ारों लोगों हताहत कर रही है... बढ़ती आबादी, बढ़ते प्रदूषण और उससे प्रभावित होने वाले भारतीय सभी धर्मों, समुदायों, जातियों, वर्गों और क्षेत्रों के हैं... 

लेकिन प्रदूषण नियंत्रण एक चुनाव जिताऊ मुद्दा नहीं है... बल्कि पर्यावरण रक्षा पर नियमों का सख़्त अमल तमाम वोट काट सकता है... पूरे समाज के लिए ज़हर बन चुके जानलेवा प्रदूषण के खिलाफ ना तो कोई मोमबत्ती जुलूस निकल सकता है और ना ही प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की पुरस्कार-वापसी के लिए यह लाभकारी मुद्दा है... सेक्युलर-साम्प्रदायिक, आरक्षण बढ़ाओ-आरक्षण हटाओ जैसे शब्दों से जूझ रही भारतीय राजनीति और बौद्धिक जमात तो खुद ही मानसिक-बौद्धिक-सामाजिक प्रदूषण फैलाकर देश का पर्यावरण छिन्न-भिन्न करने की होड़ मचाये है... आमूल भ्रष्टाचार, सत्ता-सुविधा मूलक वोटतंत्र, भाई-भतीजावाद और मज़बूत लूटतंत्र से प्रदूषित भारत का आम समाज शायद ही किसी पर्यावरण-प्रदूषण से निपटने में सक्षम हो... हम अगली पीढ़ी को किसी भी कीमत पर अधिक से अधिक कमाने-जुटाने-हथियाने के अलावा कुछ सिखा भी नहीं पा रहे हैं...  शायद हमारी विनाशकाले विपरीत बुद्धि...  #‎संतासुर


#‎संतासुर‬