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Thursday, December 3, 2015

➽ जाति ही पूछो साधु की, पूछो कभी ना ज्ञान...

अरे शैलजा माई, बेहतर होता कि संसद जैसी सर्वोच्च संस्था में आप विगत फरवरी 2013 में किसी मंदिर में आप जैसे संसदीय आभिजात्य की जाति पूछ लेने जैसा निजी और कम-गंभीर मुद्दा उठाने की बजाय तमिलनाडु में बाढ़ से तिल-तिल कर मर रहे निरीह इंसानों का मुद्दा उठातीं... वैसे, प्रचलित नियमानुसार किसी भी पूजा-कर्मकाण्ड के संकल्प-पाठ में यजमान का नाम तथा गोत्र पूछकर ही उसके नाम से संकल्प लिया जाता है... तथापि हिन्दुस्तान के लाखों मंदिरों में से कहीं किसी मंदिर में किसी मूर्ख पुजारी ने किसी का गोत्र, जाति-धर्म पूछ लिया तो यह कोई ऐसा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है कि आप संसद में तमाम जनोपयोगी बहसें और प्रश्न छोड़कर किसी एक मंदिर के प्रबंध-तंत्र को सुधारने में देश का वक़्त बर्बाद करें... यह जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि के देश की सर्वोच्च संस्था संसद में भाग लेने और प्रश्न पूछने के अधिकार का दुरुपयोग मात्र है, वह भी संसद-सत्र का येनकेन प्रकारेण समय बर्बाद करके संसदीय कार्यवाही बाधित करने के कांग्रेसी एजेण्डे के तहत...

शैलजा जी, यहाँ तो देश के सर्वोच्च मंदिर संसद में भी 543 में से 131 सांसदों की अर्हता ही उनका जातीय प्रमाण-पत्र है... यहाँ तो देश का महान संविधान ही जाति की भावना से त्रस्त-ग्रस्त लोगों द्वारा रचित-संकलित है, और स्वयं ही जातीय भेदभावों को व्यतिक्रम में स्वरुप बदलकर जारी रखने की वैधानिकता प्रदान करता है... आज़ादी के बाद अनुसूचित जाति की श्रेणी में आने वाली जातियों की संख्या जातिवादी संविधान की कृपा से 1000 से बढ़कर अब 5000 से भी अधिक हो चुकी है... आज़ादी के बाद अनुसूचित जातियों में शामिल होने से इंकार करने वाली तमाम जातियाँ भी अब बंटती मलाई के चक्कर में अनुसूची में शामिल होने के लिए संघर्ष और मुक़दमेबाजी में मशगूल हैं... देश-दुनिया ज्यों-ज्यों आगे जा रही है, त्यों त्यों भारत में संविधानी कृपा से अधिकाधिक दलित और पिछड़े बनने की होड़ मची है... जातीय सम्मेलनों के पोस्टरों में राष्ट्रनायकों, महापुरुषों और राष्ट्रनेताओं की तस्वीरें छापकर उन्हें जातीय गौरव के रूप में स्थापित किया जा रहा है... जहाँ वोटतांत्रिक लोकतंत्र की नैय्या ही जाति-धर्म की लहरों के सहारे तैर रही हो... 

जब स्वयं सरकार और शासन द्वारा जाति-प्रमाण जारी करना वैधानिक है... जब किसी भी विभागीय भर्ती परीक्षा के फॉर्म में जाति-धर्म का उल्लेख आवश्यक है... जब नियुक्तियों और साक्षात्कार के पैनलों में जाति-धर्म के आधार पर परीक्षकों का वैधानिक चयन आवश्यक होता है... जब जाति के आधार पर ट्रेड-यूनियनों के समानांतर जाति-समूह आधारित संगठन बनाना वैधानिक हो... जब चुनावों में राजनीतिक द्वारा प्रत्याशियों का चयन चुनाव-क्षेत्र की जातीय/धार्मिक वोटर आबादी के अनुसार होता है... जब राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा-पत्रों में कतिपय जातियों-धर्मों के वोटरों को लुभाने के लिए कैसी भी घोषणा की जा सकती हो... जब सभासद, विधायक, सांसद से लेकर मंत्रियों तक की जाति का हिसाब-किताब रखा जाता हो... जब मंत्रिमण्डल में शामिल होने की अर्हता योग्यता की बजाय जाति-धर्म हो... जब देश की तमाम छोटी-बड़ी सामान्य घटनाओं-दुर्घटनाओं का आंकलन भी जाति-धर्म के चश्में से किया जा रहा हो... तो अनुशासनहीन इतने विशाल राष्ट्र में किसी व्यक्ति/संस्था द्वारा किसी स्थान पर कभी धर्म-जाति पूछ लेना कोई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय घटना कतई नहीं है...

जहाँ जाति आधारित संगठन बनाना-चलाना वैधानिक हो... जहाँ जातीय-संगठनों द्वारा आयोजित सभाओं में जातीय-गौरव का बखान करते हुए दूसरी जातियों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना राजनीति का अंग हो... जहाँ जाति का सार्वजनिक उल्लेख करना कुर्सी-सुख-वैभव दिलाता हो... जहाँ सरकार द्वारा प्रमाणित जाति-तख़्ती लगाकर घूमना सब तरह से लाभदायक हो... जहाँ किसी एक जाति की सरकार में दूसरी जातियों के ख़िलाफ़ ऐलानिया दमन और भेदभाव हो... वहाँ किसी सांसद द्वारा फरवरी 2013 में किसी मंदिर में किसी रूढ़िवादी मूर्ख द्वारा महज जाति पूछ लिए जाने को महिमामण्डित करना उसकी कुत्सित मंशा को जाहिर करता है... शैलजा जी पर इससे पूर्व भी वाल्मीकि समुदाय को जाट समुदाय के खिलाफ भड़काने के लिए 10 मार्च, 2011 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में आपराधिक मुकदमा की पिटीशन दाखिल हो चुकी है... विगत फरवरी 2013 का उक्त मुद्दा अब इतने दिनों बाद संसद में उठाने के पीछे भी सांसद महोदया का उद्देश्य समाज-सुधार नहीं अपितु जातीय गन्दगी फैलाना मात्र है... 
"जाति ही पूछो साधु की, पूछो कभी ना ज्ञान। 
जंग लगे तलवार में, मोल बिक रही म्यान।।"    #‎संतासुर‬ 

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