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Wednesday, August 5, 2015

➽ बुरा मानो या भला (गुस्ताख़ी माफ़)...

एक बहुत विशाल हवेली थी, बहुत भव्य, बड़ी और पुश्तैनी… अपनी श्रेष्ठता, समृद्धि और ऐश्वर्य के दम्भ में हवेली के पुश्तैनी बाशिंदे विलासी होते चले गए… उनमें आपसी स्वार्थों के टकराव से उस विशाल हवेली पर शहर के दबंगों की नज़र लग गयी… कुछ दबंग तो हवेली का तमाम माल-मत्ता लूटकर निकल गए, लेकिन बाकी बचे दबंगों ने हवेली पर ही कब्ज़ा कर लिया… दबंगों ने बहुत लम्बे समय तक हवेली में मौज-मस्ती की… हवेली के पुश्तैनी बाशिंदों की आपसी कलह का फायदा उठकर दबंगों ने उनमें अधिकाधिक फूट डाली और उनसे मुफ़्त के नौकरों का सा काम लिया…

दूर देश से व्यापार करने निकले कुछ व्यापारी हवेली की भव्यता से आकृष्ट होकर हवेली पर कब्ज़ा किये दबंगों से मिले… उन्होंने दबंगों की चापलूसी करते हुए हवेली के अहाते में एक दूकान खोलने के लिए थोड़ी सी जगह माँगी… मदमस्त विलासी दबंगों ने सहर्ष दूकान के लिए जगह दे दी… चालाक विदेशी व्यापारी धीरे-धीरे दबंगों पर नज़र रखने लगे और हवेली की गतिविधियों में दखल देने लगे… फिर उन्होंने ऐय्याश दबंगों में फूट डालकर हवेली के एक-एक हिस्से पर कब्ज़ा ज़माना शुरू किया… और आखिर में उन धूर्त विदेशी व्यापारियों ने पूरी हवेली पर अपना कब्ज़ा कर लिया… अब हवेली के पुश्तैनी बाशिंदों के साथ हवेली में जमे दबंग भी उन शातिर विदेशी व्यापारियों के नौकर बन चुके थे…

व्यापरियों ने अपने देश के रीति-रिवाज़ों, वेश-भूषा और चाल-चलन को हवेली के नौकरों पर पूरी शिद्दत से थोपा… समय गुजरने के साथ हवेली में नौकर बन चुके पुश्तैनी बाशिंदों और दबंगों की संख्या पुश्त दर पुश्त बढ़ती गयी… उधर हवेली की समृद्धि और संसाधनों के अधिकाधिक दोहन के लिए विदेशी व्यापारियों की ज्यादतियां भी बढ़ती गयीं… आखिर में नौकरों की विशाल फ़ौज़ ने व्यापारी मालिकों के ख़िलाफ़ बगावत कर दी… विदेशी व्यापारियों ने नौकरों को दबाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अपना नुक्सान देखकर वो हवेली नौकरों के हवाले करके अपने वतन चलते बने… लेकिन जाते-जाते नौकरों को लड़ाने के लिए विदेशी व्यापारी खूबसूरत भव्य हवेली को दो टुकड़ों में बाँट गए… एक बड़ा टुकड़ा और दूसरा छोटा टुकड़ा…

ख़ैर, छोटे टुकड़े में जाने वाले नौैकर तो अधिकांश जाहिल ही रहे, जहां शुरू से ही मारकाट बनी रही… हाँ, हवेली के बड़े टुकड़े में समझदार नौकरों की संख्या भी शामिल थी… धूर्त व्यापारियों के चंगुल से आज़ाद होने के बाद बड़े टुकड़े में कुछ दिन जश्न रहा… समझदार नौकरों ने आज़ाद हवेली के सभी नौकरों के लिए कुछ नियम-कानून बनाये… कम शोषित और ज्यादा शोषित नौकर छांटें गए… अधिक सताए गए दुर्बल नौकरों को समझदार नौकरों ने हवेली में कुछ अधिक सुविधाएँ भी दीं… लेकिन नौकर तो ठहरे नौकर… कुछ दिनों बाद ही नौकरों में हवेली लूटकर अपनी निजी संपत्ति बढ़ाने की होड़ मच गयी… नौकरों के कई-कई गिरोह बन गए… सबल नौकरों के साथ ही अधिक सुविधा पाये अभावग्रस्त दुर्बल नौकरों ने भी जी भरकर लूटना शुरू कर दिया… सबसे ज्यादा लूट तो उन नौकरों ने की जो आज़ाद हवेली के व्यवस्थापक बनाये गए थे… धन-सम्पदा, सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात के बाद हवेली की दीवारों, ईंटों, खिड़की, दरवाजों तक की लूट शुरू हो गयी… और आखिर में जब सभी नौकरों को होश आया तो हवेली का सिर्फ खंडहर बचा था, जिस पर फिर किसी विदेशी व्यापारी की नज़र थी…

मुझे अक्सर लगता है कि इस ठलुआ मुल्क़ के हम सब बाशिंदे शायद लोकतंत्र और स्वशासन के लिए ना तो परिपक्व थे, ना अभी हैं और ना ही शायद अगली चार-पांच शताब्दियों तक हो पाएंगे… सदियों से हमारे डीएनए में घुस गयी गुलामी की मानसिकता ने हमें नौकरों की तरह सिर्फ अवसरवादी बना दिया है… शायद हम अभी भी इस लोकतंत्र के मालिक होने के बोध और दायित्वों को समझ ही नहीं पाये हैं… गुलामी एक मानसिकता है जो किसी भौतिक आज़ादी से कभी दूर नहीं होती… बेकाबू गुलाम को नियंत्रित और अनुशासित करने के लिए सिर्फ सख़्ती और ताकत चाहिए… #‎संतासुर‬


#‎संतासुर‬