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Friday, July 31, 2015

➽ गुरुदेव से बड़े गुरु निकले तक…

आप सभी को गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर आप सभी को बधाई और लुप्तप्राय गुरुओं को नमन… गुरु को ईश्वर और माँ-बाप से भी श्रेष्ठ बताया गया है, लेकिन अब तीनों की स्थिति नाज़ुक है… पूरी दुनिया में ईश्वर के बन्दों ने अपने कारनामों से ईश्वर की हालत पतली कर रखी है… स्वर्णिम भविष्य की तलाश में जैविक माँ-बाप का सम्मान और सेवा सिर्फ सोशल मीडिया पर ही जिन्दा है… अब रहे गुरु तो अब अधिकाँश गुरु घंटाल ही बचे हैं… पहले एक ही गुरु अपने शिष्य को आध्यात्मिक, धार्मिक, शास्त्रीय, सांसारिक और वैज्ञानिक शिक्षा देता था…


अब धर्म और अध्यात्म को छोड़कर कर प्रत्येक विषय के अलग-अलग गुरु होते हैं… एक शिष्य को उसकी उच्च शिक्षा तक उसके जीवनकाल में सैकड़ों गुरु मिलते हैं… अपने शिष्यों को अपनी संतान की तरह समझने वाले गुरुओं की जगह अब वेतन भोगी टीचरों और प्रोफेसरों ने ले ली है… पहले शिक्षा के अंत में दीक्षा के समय शिष्य अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार गुरु-दक्षिणा देता था… लेकिन अब गुरु की और उससे शिक्षा लेने की फीस पहले से ही निर्धारित होती है, जो मोटी फीस झेल सके वो शिष्य बने… अब शिक्षा एक व्यापार है, जिसमें कॉलेज विभिन्न डिग्रियों के विक्रय का शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, उस कॉलेज का माफिया-मालिक व्यापारी, शिक्षक उसके व्यापार का सेल्समैन और छात्र उस व्यापार का एक मोटा उपभोक्ता है…


रही बात जीवन-दर्शन सुधारने वाले आध्यात्मिक-धार्मिक गुरुओं की, तो यह क्षेत्र शिक्षा से भी बड़ा व्यापार बन चुका है… सभी क्षेत्रों में असफल, अशिक्षित, लोभी, लम्पट, व्यभिचारी व्यक्ति भी लाखों अनुयायियों का सम्मानित हो सकता है, बशर्ते वह एक परम धूर्त, ढोंगी और कुशल ड्रामेबाज हो… आशाराम जैसे तमामों अरबपति गुरु लाखों शिष्यों के बड़े ब्रांड हैं… ख़ैर, गुरु तो गुरु है, चेले भी शक्कर बन चुके हैं… गुरु के साथ जाम लड़ाने वाले किसी चेले से गुरु-पूर्णिमा के बारे अगर पूछ लो, तो वह शायद यही बताए कि अफ़ज़ल गुरु और पूर्णिमा बीबी की याद में पाकिस्तान में मनाये जाने वाले शोक दिवस को गुरु-पूर्णिमा कहते हैं… #‎संतासुर‬

#‎संतासुर‬