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Friday, February 27, 2015

➽ संसद में कोटपीस : विकासाराम बापू का "दहला-पकड़" प्रवचन

बजट सत्र के धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस में आज लोकसभा में दो ही चीज़ें दिखीं, पहली मनोरंजक और दूसरी दुःखद… काफी मनोरंजक था विकासाराम बापू का "दहला-पकड़" प्रवचन…  और दूसरा दुःखद था विकासाराम बापू के प्रवचन से दबी-कुचली, दीन-दुःखी असहाय सी बैठी एक माँ का बुझा चेहरा, जिसका कुलदीपक "नेता सेलेक्शन कमीशन" की परीक्षा से ऐन पहले ही घर से कहीं भाग गया हो… विकासाराम बापू के धाराप्रवाह प्रवचन पर मगन भक्तों की गड़गड़ाती तालियां संसद के आँगन में पथराई सी आँखों से निहारती उस लाचार माँ के कलेजे पर मानो हथौड़े की तरह चोट कर रही थीं…

विकासाराम बापू ने एक बढ़िया अभिनय के साथ भावनाओं की चाशनी में लपेट कर विकास की मोटी-मोटी जलेबियाँ बनाने की अनुज्ञा प्राप्त करने हेतु देश के माननीयों से पेशेवर अपील की… उन्होंने विपक्ष से आज तक पुराने सभी भ्रष्टाचारों के मामले भुलाकर अब उनके साथ मिलजुल कर स्याह-सफ़ेद करने का आह्वान किया… मतलब साफ़, कि तुम तानाशाही में दो हमारा साथ, हम कर देंगे तुम्हारे पुराने पाप-गुनाह सब माफ़…

देश के माननीयों की परम-सभा में तालियां पीट-पीटकर विकासाराम बापू ने सभी निष्कर्मों को आत्म-पुराण से अभिसिंचित कर अपना विराट स्वरुप सुनाया… किसानों की  जमीनें किसी भी तरह बिकवाने की चिंता में डबडबा आयी उनकी क्रूर-निष्ठुर आँखों से देश के पैसाखोर उद्योगपति तक रो पड़े… बापू ने पूरी ढिठाई से भ्रष्टाचार-नियंत्रण और जनलोकपाल पर कोई चर्चा नहीं की… दरअसल पुराने मौनी बाबा गिरोह से बेहतर विकसित भ्रष्टाचार हमारे गुजरात आश्रम के ईमानदार संत विकासाराम बापू का हिडेन एजेण्डा है…

विकासाराम बापू ने विदेश के कालेधन पर किये हवन-पूजन के लिए अपने सहयोगी स्वामी जेटलिम्बरम् की प्रशंसा की… लेकिन उन्होंने देश के अंदर समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे और मंहगाई बढ़ा रहे आंतरिक कालेधन पर "कॉर्पोरेट-चौथ" का व्रत-संयम रखा… आंतरिक कालेधन को घटाने और जब्त करने लिए कोई विधेयक लाने की बजाय वो भूमिअधिग्रहण अध्यादेश के जरिये रियलस्टेट में देशी कालाधन खपवाने हेतु आतुर दिखे… हे विकासाराम बापू, इस गरीब देश की भोली-भाली जनता सदियों से ही वचनों के नाम पर लच्छेदार प्रवचनों से ही तो लुटती रही है… एक बार और सही… #‎संतासुर

#‎संतासुर

Thursday, February 26, 2015

➽ गडकरी जी ज़रा मोदी जी से पूछकर ही बता दीजिये…? वर्ना अजर-अमर तो हिटलर भी नहीं था…

               आज गडकरी जी टीवी पर पूरी बेशर्मी से बता रहे थे कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाना इतना ज़रूरी था कि संसद-सत्र का इंतज़ार करना संभव नहीं था… गडकरी जी ने बताया कि अध्यादेश लागू होने से अब तक महाराष्ट्र में किसानों को दो हज़ार करोड़ का मुआवज़ा मिल चुका है…

                भारत के हज़ारों साल के इतिहास में इतना परम-योग्य प्रधानमंत्री और इतनी काबिल सरकार शायद पहली बार आयी है जो विकास की गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाने के नाम पर ट्रैफिक सिग्नल तोड़ते हुए पैदल मुसाफ़िरों को कुचलने पर आमादा है… गडकरी जी क्या आप बताएँगे --

1. गडकरी जी, देश-विदेश के उद्योगपति हमारी अधिकाँश कृषि योग्य ज़मीन खरीदने में सक्षम हैं… तो अगर उद्योगपति विकास के नाम पर पूरे देश की कृषि-योग्य भूमि का मुआवजा देने की योजना पेश करें तो क्या देश भर की उनकी मनपसंद कृषि-भूमि आप किसानों को मुआवज़ा देकर दिलवा देंगे…? ख़ैर आप तो खुद उद्योगपति हैं…

2. गडकरी जी, कृषि-उद्योग के अंतर्गत आधुनिक वैज्ञानिक-कृषि के नाम पर अगर उद्योगपति लाखों एकड़ कृषि-भूमि खरीदने की इच्छा करें तो क्या मुआवज़ा देकर उन्हें कृषि-भूमि लेने से आप या कोई अगली सरकार बदले हुए अपने क़ानून से रोक पाएंगे…?

3. गडकरी जी, सैकड़ों सालों से पुश्तैनी कृषि कर रहा किसान मुआवज़ा लेकर कौन सा रोज़गार करके रोटी कमायेगा…? या फिर वो अपने ही खेतों में होने वाले कंक्रीट निर्माणों में मज़दूरी करेगा…? क्योंकि मुआवज़े की धनराशि उसके परिवार का आजीवन भरण-पोषण नहीं कर सकती…

4. गडकरी जी, पीढ़ियों से और अपने जीवन में सिर्फ़ कृषक रहे किसी व्यक्ति के लिए क्या यह संभव है कि वह मुआवज़े में मिली लाखों अथवा करोड़ों रुपयों  की धनराशि को सुरक्षित जगहों पर सुगम तरीकों से निवेश कर सके…? कर-मुक्त कृषि आय की जगह कर-युक्त आय के झमेलों के साथ ही अधिक आय के लालच में जमा-पूँजी के गँवा देने का खतरा सो अलग…

5. विकास और खुली अर्थव्यवस्था के नाम पर बढ़ते आयात से निपटने के लिए निर्यात बढ़ाना ज़रूरी है… कृषि-प्रधान देश होने के नाते तमाम कृषि उत्पाद हम निर्यात करते हैं… अंधाधुंध कृषि-भूमि अधिग्रहण से कृषि-उपज निर्यात तो दूर बल्कि कृषि भूमि घटने से शायद खाद्यान्न आयात बढ़ाना पड़े…

6. गडकरी जी, ग़रीबों को आवास देने के नाम पर भूमि-अधिग्रहण का बहाना आपकी दलालों की सरकार की धूर्तता मात्र है… दूर-दराज़ के गाँवों की कृषि-भूमि और खेतों पर गरीबों के लिए कौन मकान बनवायेगा और कौन सा गरीब उन्हें खरीदेगा…? दरअसल विदेशों से कहीं ज्यादा कालाधन देश के अंदर है, जिस पर आपकी सरकार पूरी मक्कारी से चुप है… और देश के अंदर का अधिकाँश कालाधन रियल-स्टेट में ही लगा है… जबकि ज़मीनों की आसमान छूती कीमतों की वजह से गरीब आदमी अपने मकान से महरूम है ना कि ज़मीनें कम होने से… सच तो यह है प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप के नाम पर भूमि अधिग्रहण करके आप अपनी हितैषी रियल-स्टेट कंपनियों को चुनाव जिताने का तोहफ़ा देना चाहते हो…?

                गडकरी जी, न्यूनतम विनाश पर अधिकतम विकास सरकार का लक्ष्य होना चाहिए, ना कि सीमित विकास के लिए असीमित विनाश… फिलहाल भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर देश के पीएम की हठधर्मिता और हिटलरशाही से तो यही कि देश की जनता ने गलती से बन्दर के हाथ में उस्तरा पकड़ा दिया है… ख़ैर दिल्ली की जनता ने समय रहते गलती सुधार ली और यूपी-बिहार की जनता असेम्बली चुनाव में बंदरों को असेम्बली में घुसने नहीं देगी… #‎संतासुर‬

#‎संतासुर‬

Thursday, February 12, 2015

➽ वैलेंटाइन डे पवित्र राष्ट्रीय महापर्व घोषित हो…

            प्रगतिशील और आधुनिक बनने के लिए आवश्यक है कि वैलेंटाइन डे को राष्ट्रीय महापर्व घोषित किया जाए… प्यार के क्षेत्र में पिछड़ापन दूर करने के लिए 100% एफडीआई घोषित की जाये… इस दिन पूरे हिन्दुस्तान में प्यार का सैलाब आना चाहिए, प्यार के अंधड़ चलने चाहिए… छूट होनी चाहिए कि इस दिन जो जिसको चाहे प्रोपोज़ करे, जहाँ मन हो लेकर टहले… हर वर्ष 14 फरवरी मनाने के लिए प्रत्येक गाँव, कस्बे और शहरों के मुहल्लों में घनी झाड़ियों युक्त बड़े-बड़े पार्क होने चाहिए… अगर जगहें कम पड़ें तो इस दिन सरकारों को सड़कों, खेतों, पगडण्डियों के किनारे कनातें वगैरह लगाकर आड़ बना देनी चाहिए ताकि वैलेंटाइनों के जत्थे एकांत में प्रेम-रस से भरपूर स्नान-ध्यान कर सकें… जगह-जगह चाकलेट, गुलाब, बुके और लव-गिफ़्ट की सब्सिडी वाली सरकारी दुकानें होनी चाहिए…

             सभी प्रगतिशील आधुनिक माँओं-बापों को अपने बेटों-बेटियों को यह महापर्व झाड़ियों, सडकों, पार्कों, रेस्तराओं, रिजॉर्ट्स वगैरह में धूमधाम से मनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए… अपने सुपुत्रों-सुपुत्रियो को इस दिन के लिए भरपूर धन, वाहन, उपहार, भड़काऊ वस्त्रादि प्रदान करें… वैलेंटाइन अनुष्ठानों और कर्मकाण्डों के प्रति अगली पीढ़ी को शिक्षित और जागरूक करने के लिए वैलेंटाइन सप्ताह के समस्त कर्मकाण्ड कक्षा एक से ही स्कूलों में अनिवार्य किये जाएँ… सामाजिक पिछड़ापन दूर करने हेतु पांच साल के ऊपर के सभी बच्चों और युवाओं के लिए ब्वॉय अथवा गर्ल फ्रेण्ड होना अनिवार्य किया जाए… वैलेंटाइन डे के ख़ास-ख़ास विधि-विधानों को टीवी और डॉक्यूमेंटरी के ज़रिये दिखाकर पूरे देश में इसे मनाने के लिए जागरूकता अभियान चलाना चाहिए…

           अगले चुनावों में वैलेंटाइन डे और इससे सम्बंधित  क्रियाओं-प्रक्रियाओं को चुनावी घोषणा-पत्रों में शामिल किया जाये… छिछोरेपन और प्यार के बीच का अंतर समाप्त करने के लिए सरकारों द्वारा विधेयक लाया जाए… वैलेंटाइन डे पर प्यार के प्रस्फुटन और प्रदर्शन के लिए विवाहितों को भी चिर-क्वाँरा माना जाए… प्यार होना ही काफी नहीं जब तक कि प्यार सार्वजनिक और भौतिक रूप से प्रदर्शित ना हो… इसलिए सम्पूर्ण भौतिक विधि-विधान से प्यार के सुगम सार्वजनिक मंचन के लिए सांस्कृतिक मंत्रालय के अधीन वैलेंटाइन विभाग खोला जाये… संत वैलेंटाइन को राष्ट्र-संत घोषित किया जाए… बदलते परिवेश में वैलेंटाइन कर्मकांडों और प्यार के तौर-तरीकों की अधिकाधिक खोजों के लिए यूजीसी द्वारा विश्वविद्यालयों में रिसर्च-सेल बनवाई जाएँ… बकौल मॉडर्न ख़बीरा --

"प्रेम व्हाट्सऐप ऊपजै, प्रेम एफबी पर दिखाय। 
राजा परजा जेहि रुचै, झाड़ी मा लइ जाय।।"   #‎संतासुर‬