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Tuesday, December 30, 2014

➽ मेरे भोले औघड़ शिव ने तेरा क्या बिगाड़ा रे मॉडर्न महर्षि हिरानी और लेटेस्ट पैगम्बर आमिर रसूल…?

                मेरे गणेश के हाथी की सूढ़ है और हनुमान के वानरों वाली पूंछ… यह मेरी निजी आस्था है, किसी को कोई आपत्ति…? मैं जानता हूँ कि ईश्वर कहीं और नहीं बल्कि हमारे अंदर ही है… और यह भी जानता हूँ कि ईश्वर ने हमें भले ना बनाया हो, परन्तु हमने अपने लिए एक अदद ईश्वर की रचना ज़रूर की है… उस अज्ञात, अदृश्य, अपरिभाषित, अनजान, असीम, अनाम, अभेद, अखेद, अबूझ, अनंत, अखण्ड, निरपेक्ष ईश्वर का अहसास हमें इस जीवन-संघर्ष को जीतने के लिए आत्मबल प्रदान करता है… सीमा पर दुश्मनों और मौत से जूझ रहे किसी सैनिक के लिए जय बजरंग बली, या अली, अल्लाह हो अकबर, जय माँ भवानी, बोले सो निहाल जैसे चंद शब्द अपार ऊर्जा और विजय का आत्मबल भर देते हैं… तिल-तिल कर मर रहे किसी लाइलाज़ मरीज़ के लिए राम, अल्लाह, गॉड, वाहे गुरु आदि का नाम एक कष्टहारी औषधि है जो किसी भी औषधि विज्ञान से परे है…

                 अगर किसी निर्जीव पत्थर को शिवलिङ्ग मानकर पूजने का मेरा आडम्बर मुझे आत्मिक शांति और सम्बल प्रदान करता है और इससे किसी दूसरे का अहित नहीं होता, तो इसमें किसी आमिर, हिरानी या आडवाणी को क्या दिक्कत है मेरे भाई…? धरती के अन्य स्तनपायी प्राणियों की ही तरह मनुष्य के लिए भी आहार, निद्रा और मैथुन (वंशवृद्धि) के अलावा सब कुछ आडम्बर ही तो है… दूसरे ग्रह से आया कपोल-कल्पित "पीके" सत्य है, और सदियों से मान्य शिव आडम्बर…? कपड़े पहनना भी तो आडम्बर ही है, प्राकृतिक चीज़ों को ढकना कैसा…? तो क्या आमिर को अपने परिवार वालों को ट्रांजिस्टर लटका कर नंगा रखना चाहिए…? मानवीय रिश्ते भी तो आडम्बर ही हैं, मनुष्य के अलावा अन्य पशुओं में तो नहीं होते… तो क्या आमिर, हिरानी और आडवाणी को अपनी माँ, बहन, बीबी और बेटी को सिर्फ़ एक औरत मानकर भोगना चाहिए…?

                 अगर फिल्म का सौ-दो सौ करोड़ कमा लेना फिल्म के औचित्य को सिद्ध करता है, तो पार्नोग्राफिक फिल्में/साहित्य और नशीली दवाएं तो प्रतिबंधित होने के बावजूद दुनिया में सर्वाधिक कमाई का जरिया हैं… तो क्या अकूत कमाई के आधार पर अश्लील फिल्मों/साहित्य, दवाइयाँ, अवैध हथियारों के व्यापार को औचित्यपूर्ण आवश्यक उद्योग घोषित कर दिया जाये…? सवाल यह भी तो है कि सभी धर्मों की व्यक्तिगत आस्थाओं से जुड़े सभी मामलों पर सही गलत तय करने का अधिकार आमिर और हिरानी ने कहाँ से प्राप्त किया…? सभी धार्मिक आस्थाओं को मान्यता देने वाले भारतीय संविधान को क्या आमिर और हिरानी ने मात्र आडम्बर नहीं साबित कर दिया…? दूसरे की आस्थाओं पर बेवज़ह चोट करने या मनोरंजन के नाम पर खिल्ली उड़ाने का अधिकार संविधान की किस धारा में निहित है ओ मौलाना आमिर…?

                 पशु कोई आडम्बर नहीं मानते,  कोई धर्म नहीं मानते और ईश्वर को भी मानते… इसलिए क्या पशु इंसानों से बेहतर हैं…? लिहाजा क्या हमें पशु समाज के नियमों को मानना चाहिए…?  तो फिर क्या क़ानून और संविधान जैसे अप्राकृतिक आडम्बरों को लांघते हुए आमिर, हिरानी और आडवाणी से पूरी पाशविकता के साथ निपटना चाहिए…? पूरा फ़िल्मी समाज ही एक धोखा है, छलावा है, लम्पट और लोभी है तो क्या इसे भी खत्म कर दिया जाना चाहिए…?  आस्थाएं आडम्बर नहीं होतीं, बल्कि आडम्बर होता है आस्थाओं को अपने स्वार्थ में भुनाना…और आमिर भी तो किसी पंडित, महंत, मुल्ला, पादरी की ही तरह आस्थाओं को पेट के लिए अपने स्वार्थ में भुना ही रहे हैं, आडम्बर दूर करने के नाम पर… धार्मिक आडम्बरों पर निःस्वार्थ चोट कोई चोट्टा आमिर नहीं बल्कि कबीर की तरह का कोई संत ही कर सकता है… #‎संतासुर‬  


‪#‎संतासुर‬

Saturday, December 13, 2014

➽ हरियाणा का रामपाल अंदर, दिल्ली का शाही इमामपाल सिकंदर…?

                       संत रामपाल तो अंट-शंट उगलकर देशद्रोह के आरोप में शंट हो गए… अब परम संत बुख़ारी को देश बांटने का बुखार चढ़ गया है…  हिन्दुस्तान ना हो गया बुखारी के बाप की जागीर हो गया… सच तो यह है कि देश को बांटने की धमकी देने वालों को चौराहे पर लटकाकर कई टुकड़ों में बाँट देना चाहिए… यूंकि इस देश में कुछ भी बोलने की आज़ादी है और पकड़े जाने पर माफ़ी ही काफ़ी है… गोया मुल्क ना हो गया बीएसएनएल का रिटायर्ड खम्भा हो गया, कोई भी कुत्ता आये और टांग उठाकर आचमन करके चला जाये… भई वाह…

                  दरअसल वोट बैंक की राजनीति के कारण ही बुखारी जैसे राष्ट्रीय बुखार सत्ता की मलाई खाकर देश को ही काटने दौड़ रहे हैं…  वर्ना तमाम वारंट होने के बावजूद, तमाम बार देशद्रोही जहर उगलने के बावजूद, तमाम आर्थिक/आपराधिक आरोप होने के बावजूद कोई भी सत्तारूढ़ दल इस मगरूर को गिरफ़्तार करने से घबराता रहा है… यदि कोई धर्मगुरु अपराधिक कृत्य करता है, सामाजिक घृणा फैलाता है, उसके कृत्य या वक्तव्य राष्ट्रद्रोही हैं तो उसे अविलम्ब कानून के हवाले करने चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म का, किसी भी स्तर धर्मगुरु हो…

                      परन्तु विडम्बना है कि इस धर्म-निरपेक्ष देश में आपराधिक कृत्यों, सम्भाषणों, कदाचार, दुराचार अथवा राष्ट्रद्रोह में गिरफ्तार होने वाले अधिकाँश धर्मगुरु एक धर्म-विशेष के ही होते हैं… भ्रष्टाचार और अराजकता से लबालब इस आस्थावान देश में बाकी सभी धर्मों में कोई भी धर्माचार्य या धर्मगुरु ठग, बेईमान, गड़बड़ नहीं है...  लगता तो ऐसा है कि सिर्फ एक धर्म विशेष के पूजा-स्थल ही गड़बड़ हैं और अकूत सम्पदा वाले हैं, जबकि बाकी सारे धर्मों की धार्मिक संस्थाएं कंगाल और पाक-साफ़ हैं…

                   धर्म-निरपेक्षता के नाम पर यह वोट बैंक की राजनीति ही देश में बढ़ रहे राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए जिम्मेदार है… ख़ास तौर पर लालू, मुलायम, नितीश, ममता जैसे सत्ता-लोलुपों की जाति-धर्म आधारित गंदी राजनीति से केवल एक मज़हब के अपराधी तत्वों को संरक्षण मिल रहा है, बल्कि प्रतिक्रिया में दूसरे धर्म के अतिवादियों/ कट्टरपंथियों को खेलने के अवसर भी मिल रहे हैं… और इन भ्रष्ट राजनेताओं और लालची धर्माचार्यों के कुकर्मों का खामियाजा झेलती है देश के सभी धर्मों-जातियों की वास्तविक आम जनता…  #‎संतासुर‬

#‎संतासुर‬


Tuesday, December 9, 2014

➽ गीता पर महाभारत करके गीता की सुषमा ना बिगाडिये प्लीज़…

                  माननीया सुषमा जी, माफ़ कीजियेगा बेचारी गीता ने आपका क्या बिगाड़ा है कि राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करके उसकी सुषमा बिगाड़ने में लगी हैं…? राष्ट्रीय घोषित चिन्हों, पहचानों, प्रतीकों और धरोहरों की स्थिति किसी नगर-वधू जैसी हो जाती है…  मतलब कि यूँ तो सबकी लेकिन हक़ीकत में किसी की नहीं…  अब देखिये न, राष्ट्रीय पशु शेर की हालत पहले से ही पतली है, गोया अपने वज़ूद की आख़िरी लड़ाई लड़ रहा है… राष्ट्रीय-पक्षी मोर का हाल भी राष्ट्रीय-पशु शेर से बेहतर नहीं है…

                   राष्ट्रीय-पुष्प कमल भी कंक्रीट के बढ़ते जंगलों की भेंट चढ़ चुका है… वैसे भी कमल राष्ट्रीय-पुष्प की बजाय विवादित भाजपा के चुनाव चिन्ह के रूप में अधिक जाना जाता है…  राष्ट्रीय खेल हॉकी क्रिकेट के बाउंसर खाकर राष्ट्रीय-खिलवाड़ बन चुका है…  राष्ट्रभाषा हिन्दी अब फूहड़ फ़िल्मी गानों, भद्दी गालियों और सरकारी टाट-पट्टी वाले स्कूलों के दम पर ज़िंदा रहकर इस देश में अंग्रेजी की चाकरी कर रही है…

                   राष्ट्र-गान जन-गण-मन में सिंध को निकालने के लिए मुकदमेबाजी हो रही है… राष्ट्र-गीत वन्दे मातरम् को राष्ट्र के 20 प्रतिशत नागरिक साम्प्रदायिक मानकर गाने से ही इंकार कर देते हैं… भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों द्वारा दुरुपयोग करने से राष्ट्रीय-चिन्ह अशोक-स्तम्भ भी अब आम जनता में सम्मान खो सा चुका है… राष्ट्रीय-ध्वज तिरंगा के केसरिया और हरे रंग साम्प्रदायिक घोषित होकर सफ़ेद रंग और अशोक-चक्र पर आधिपत्य के लिए आपस में लड़कर लाल छीटें छोड़ रहे हैं …

                 गोलियां खा चुके राष्ट्र-पिता की आत्मा गालियां खाकर सिसक रही होगी… सरकार के पास उनको महात्मा गांधी घोषित करने की वैधता का परिपत्र अथवा शासनादेश तक नहीं है… राष्ट्र-पिता का प्रिय राष्ट्रीय-वस्त्र सूती खादी अब मंहगी होकर भ्रष्टों-बेईमानों की प्रिय यूनिफार्म हो गयी है और आम जनता की घृणा का पात्र है… इस कृषि-प्रधान देश का राष्ट्रीय-रोज़गार कृषि अब हेय और उपेक्षित पेशा है, राष्ट्र का पेट भरने वाला किसान खुद भूखों मर रहा है…

                राष्ट्रवाद शब्द ही अब स्वयंभू सेक्युलरों द्वारा साम्प्रदायिक घोषित किया जा चुका है… वैसे भी अब दोगली राष्ट्रीयता अर्थात दोहरी राष्ट्रीयता का जमाना है… राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रथम नागरिक होता है, तमाम राष्ट्रपतियों की स्थिति जनता देख चुकी है…  जिनको राष्ट्र के लोग मर्यादा पुरुषोत्तम और आचरण का पैमाना मानते थे… नमस्कार की जगह जिनका नाम लेकर अभिवादन करते थे… जिनका नाम तमाम लोगों को कुर्सी, दौलत, शोहरत दिला चुका है… वो राष्ट्र-पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम खुद ही राष्ट्रवादियों और राष्ट्रबंधुओं के कारण फटे तम्बू में सिकुड़े पड़े हैं…

                पवित्र ग्रन्थ गीता जिस महाकाव्य महाभारत का हिस्सा है वह समूचा महाभारत ही हस्तिनापुर राष्ट्र के कुछ जिम्मेदार लोगों की नासमझी और हठधर्मिता का परिणाम था… धृतराष्ट्र, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनि तो किसी भी राष्ट्र के पतन के लिए काफी हैं, लेकिन भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य भी कम जिम्मेदार नहीं हुआ करते हैं…

                स्विस बैंकों में काला-धन रखने वालों में भी कई गीता-रामायण-कुरआन-बाइबिल के मर्मज्ञ परम धार्मिक होंगे… निर्दोष नागरिकों के खून से नहा रहे तमाम राष्ट्रों में कुरआन अथवा बाइबिल राष्ट्रीय ग्रन्थ होंगे… और सच तो यह है कि दुनिया में कुरआन और बाइबिल की मनमाफिक स्वयंभू व्याख्या ही कत्लोगारद का सबसे बड़ा कारण है… गनीमत है कि गीता की व्याख्या करने वाला कोई तिलकधारी बगदादी या चुटियाधारी लादेन अभी तक नहीं हुआ है…

                बेहतर होगा कि गीता पर कोई राजनीतिक महाभारत ना किया जाय… गीता में पलीता लगाकर अब कोई नया महाभारत रचने की बजाय "महान भारत" की रचना के बारे में सोचिये… गीता तो पहले से ही अंतर्राष्ट्रीय ग्रन्थ है, अब उसका दर्ज़ा सिकोड़कर राष्ट्रीय बनाने का कष्ट ना करें प्लीज़…    #‎संतासुर‬  

Tuesday, September 30, 2014

➽ स्वच्छता पर किसी JNU मार्का प्रगतिशील बुद्धिजीवी की लघु एवं दीर्घशंकाएं--

              मुझे तो यह साफ़-सफाई परियोजना एक पूँजीवादी साम्राज्यवादी साजिश लगती है… यह सब पूंजीपतियों के पूंजीवादी दबाव में किया जा रहा है… अब यूंकि इसी बहाने लाखों झाड़ू-पंजे-डण्डे बिकेंगे, रंग-रोगन का सामान, पेंट, ब्रश, डस्टर वगैरह बिकेंगे… अब इससे पूंजीपति और उद्योगपति अरबों का भारी मुनाफ़ा कमाएंगे… और अग़र देश के लोगों को एक बार साफ़-सफाई की आदत पड़ गई तो भविष्य में झाड़ू-पंजा-डस्टर वग़ैरह की जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी करके आगे भी व्यापारी और उद्योगपति भारी मुनाफ़ा कमाते ही रहेंगे…

             125 करोड़ लोगों की साफ़-सफाई की आदत पड़ने पर साबुन-सोडा-शैम्पू-तौलिया की बिक्री बढ़ने से ये पूंजीवादी अरबों रुपये कमाएंगे… सफाई-सेवाओं, सफाई-सामग्री और सफाई-उपकरणों के क्षेत्र में सरकार 100% FDI ले आएगी और देश का झाड़ू-पंजा-डस्टर-साबुन-सोडा उद्योग बंद हो जाएगा… हम विदेशी कंपनियों के एक साफ़-सुथरे गुलाम हो जाएंगे… राष्ट्रव्यापी सफाई अभियान की आड़ में लाखों-करोड़ के घोटाले भी होंगे…

               सफाई के बहाने सरकार की साज़िश का अगला लक्ष्य पान, पान-मसाला, खैनी इत्यादि सामाजिक एकीकरण बढ़ाने वाले पदार्थों के प्रतिबन्ध का होगा… कार्यालयों में पान की कलात्मक पीकेँ अफ़सरशाही और प्रबन्धतंत्र के खिलाफ शोषित वर्गकी चुनौती को प्रदर्शित करती हैं… साफ़-सुथरा कार्यालय प्रबंधतंत्र की तानाशाही तथा एकाधिकार का द्योतक होता है…  किसी अनपढ़ अकुशल बेरोज़गार के लिए भी पान की दुकान न्यूनतम पूंजी लगाकर जीविकोपार्जन का उत्तम साधन है… पान की दुकान सामाजिक समरसता और सर्वहारा का सभा-स्थल होता है…  पान एवं पान मसाला बंद होने से लाखों सर्वहारा किसानों, मज़दूरों, दुकानदारों के लिए आजीविका का संकट होगा…

            और फिर जब लोग साफ़ सुथरे रहेंगे तो हो सकता है कि स्वच्छ तन-मन से मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे जाने वालों की संख्या बढ़ जाए… अत्यधिक साफ़-सफाई-स्वच्छता मनुवादियों और ब्राह्मणवादियों की गम्भीर साजिश भी हो सकती है… इससे देश में साम्प्रदायिकता बढ़ने और साम्प्रदायिक ताकतों के मज़बूत होने का खतरा है… दलित और मलिन बस्तियां साफ़ रहने से वहाँ के नागरिक पूंजीवाद की ओर आकर्षित होकर हमारे वोट-बैंक से सटक जाएंगे… अधिक साफ़-सफाई रखने से ना केवल उपभोक्तावाद बढ़ेगा बल्कि ग़रीब जनता पूंजीवादियों के चंगुल में फंसेगी…

             गन्दगी फ़ैली रहने से कूड़ा-करकट तो समानता के सिद्धांत के तहत चतुर्दिक व्याप्त रहता है… साफ़-सफाई रखने से कूड़े का क्षेत्रीय ध्रुवीकरण बढ़ेगा, जो क्षेत्र विशेष के लिए घातक होगा… कूड़ा और गन्दगी के फलस्वरूप उत्पन्न और प्रसारित बीमारियों से चिकित्सा-स्वास्थ्य सेवाओं, औषधियों के शोध, निर्माण और बिक्री में लाखों बेरोज़गारों को रोज़गार मिलता है…  साफ़-सफाई होने पर तमाम आवारा पशुओं को आहार ना मिलने से पशुप्रेमियों के समक्ष उनके अस्तित्व का गंभीर संकट होगा… आइये इस सफाई अभियान का पूरी सफाई से पर्दाफ़ाश करें और इस सफ़ाई अभियान की ही सफ़ाई कर दें… दुनिया के मलिच्छों एक हो, पूंजीवाद के खिलाफ एक हो… ख़बरदार…! होशियार...! सफाई बुर्जुवावाद का सौम्य स्वरुप है...  #‎संतासुर‬