माननीया सुषमा जी, माफ़ कीजियेगा बेचारी गीता ने आपका क्या बिगाड़ा है कि राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करके उसकी सुषमा बिगाड़ने में लगी हैं…? राष्ट्रीय घोषित चिन्हों, पहचानों, प्रतीकों और धरोहरों की स्थिति किसी नगर-वधू जैसी हो जाती है… मतलब कि यूँ तो सबकी लेकिन हक़ीकत में किसी की नहीं… अब देखिये न, राष्ट्रीय पशु शेर की हालत पहले से ही पतली है, गोया अपने वज़ूद की आख़िरी लड़ाई लड़ रहा है… राष्ट्रीय-पक्षी मोर का हाल भी राष्ट्रीय-पशु शेर से बेहतर नहीं है…
राष्ट्रीय-पुष्प कमल भी कंक्रीट के बढ़ते जंगलों की भेंट चढ़ चुका है… वैसे भी कमल राष्ट्रीय-पुष्प की बजाय विवादित भाजपा के चुनाव चिन्ह के रूप में अधिक जाना जाता है… राष्ट्रीय खेल हॉकी क्रिकेट के बाउंसर खाकर राष्ट्रीय-खिलवाड़ बन चुका है… राष्ट्रभाषा हिन्दी अब फूहड़ फ़िल्मी गानों, भद्दी गालियों और सरकारी टाट-पट्टी वाले स्कूलों के दम पर ज़िंदा रहकर इस देश में अंग्रेजी की चाकरी कर रही है…
राष्ट्र-गान जन-गण-मन में सिंध को निकालने के लिए मुकदमेबाजी हो रही है… राष्ट्र-गीत वन्दे मातरम् को राष्ट्र के 20 प्रतिशत नागरिक साम्प्रदायिक मानकर गाने से ही इंकार कर देते हैं… भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों द्वारा दुरुपयोग करने से राष्ट्रीय-चिन्ह अशोक-स्तम्भ भी अब आम जनता में सम्मान खो सा चुका है… राष्ट्रीय-ध्वज तिरंगा के केसरिया और हरे रंग साम्प्रदायिक घोषित होकर सफ़ेद रंग और अशोक-चक्र पर आधिपत्य के लिए आपस में लड़कर लाल छीटें छोड़ रहे हैं …
गोलियां खा चुके राष्ट्र-पिता की आत्मा गालियां खाकर सिसक रही होगी… सरकार के पास उनको महात्मा गांधी घोषित करने की वैधता का परिपत्र अथवा शासनादेश तक नहीं है… राष्ट्र-पिता का प्रिय राष्ट्रीय-वस्त्र सूती खादी अब मंहगी होकर भ्रष्टों-बेईमानों की प्रिय यूनिफार्म हो गयी है और आम जनता की घृणा का पात्र है… इस कृषि-प्रधान देश का राष्ट्रीय-रोज़गार कृषि अब हेय और उपेक्षित पेशा है, राष्ट्र का पेट भरने वाला किसान खुद भूखों मर रहा है…
राष्ट्रवाद शब्द ही अब स्वयंभू सेक्युलरों द्वारा साम्प्रदायिक घोषित किया जा चुका है… वैसे भी अब दोगली राष्ट्रीयता अर्थात दोहरी राष्ट्रीयता का जमाना है… राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रथम नागरिक होता है, तमाम राष्ट्रपतियों की स्थिति जनता देख चुकी है… जिनको राष्ट्र के लोग मर्यादा पुरुषोत्तम और आचरण का पैमाना मानते थे… नमस्कार की जगह जिनका नाम लेकर अभिवादन करते थे… जिनका नाम तमाम लोगों को कुर्सी, दौलत, शोहरत दिला चुका है… वो राष्ट्र-पुरुष मर्यादा पुरुषोत्तम खुद ही राष्ट्रवादियों और राष्ट्रबंधुओं के कारण फटे तम्बू में सिकुड़े पड़े हैं…
पवित्र ग्रन्थ गीता जिस महाकाव्य महाभारत का हिस्सा है वह समूचा महाभारत ही हस्तिनापुर राष्ट्र के कुछ जिम्मेदार लोगों की नासमझी और हठधर्मिता का परिणाम था… धृतराष्ट्र, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनि तो किसी भी राष्ट्र के पतन के लिए काफी हैं, लेकिन भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य भी कम जिम्मेदार नहीं हुआ करते हैं…
स्विस बैंकों में काला-धन रखने वालों में भी कई गीता-रामायण-कुरआन-बाइबिल के मर्मज्ञ परम धार्मिक होंगे… निर्दोष नागरिकों के खून से नहा रहे तमाम राष्ट्रों में कुरआन अथवा बाइबिल राष्ट्रीय ग्रन्थ होंगे… और सच तो यह है कि दुनिया में कुरआन और बाइबिल की मनमाफिक स्वयंभू व्याख्या ही कत्लोगारद का सबसे बड़ा कारण है… गनीमत है कि गीता की व्याख्या करने वाला कोई तिलकधारी बगदादी या चुटियाधारी लादेन अभी तक नहीं हुआ है…
बेहतर होगा कि गीता पर कोई राजनीतिक महाभारत ना किया जाय… गीता में पलीता लगाकर अब कोई नया महाभारत रचने की बजाय "महान भारत" की रचना के बारे में सोचिये… गीता तो पहले से ही अंतर्राष्ट्रीय ग्रन्थ है, अब उसका दर्ज़ा सिकोड़कर राष्ट्रीय बनाने का कष्ट ना करें प्लीज़… #संतासुर
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