क्या कहा, न्याय अँधा होता है…? झूठ, कतई झूठ… अब न्याय अँधा नहीं रह गया… स्वतंत्र भारत में तमाम धन-कुबेर धर्मात्मा दानदाताओं के रहमोकरम से न्याय को आँखें मिल गयी हैं… न्याय की इन चांदी की आँखों पर सोने की पलकें और उनके बीच हीरों की पुतलियाँ हैं… चमचमाती क्रूर बेहया आँखों में दौलत की चमक, और पलकों के गिरने-उठने पर सिक्कों की ठनक है… न्याय को अपनी इन बेशकीमती आँखों से सिर्फ बेशकीमती चीज़ें ही दिखती हैं, सिर्फ़ बेशकीमती लोग ही दिखते हैं और सिर्फ़ बेशक़ीमती ज़िंदगियाँ ही दिखती हैं…
न्याय को दानदाताओं से मिली इन बेशक़ीमती आँखों से बिना पूंछ वाले दो पैरों के भूख से बेहाल सड़कों पर सोते हुए कुत्ते नहीं दिखते… न्याय को फाँसियों पर लटकते हुए अन्नदाता नहीं दिखते… न्याय को इज़्ज़त और शोहरत तो दिखती है, लेकिन चीखती हुई न्याय-न्याय पुकार कर बेदम होती आबरुएँ नहीं दिखतीं… न्याय की चांदी की आँखों में पानी नहीं है, मर चुका है… न्याय की सोने की पलकों में लाज-हया का वजन नहीं है… न्याय की हीरे की पुतलियों में रहम-दया नहीं अपितु अपनी श्रेष्ठता का दम्भ परावर्तित करती हुई क्रूरता और निर्दयता है…
आँखें मिलने से न्याय अन्याय में समाहित हो चुका है: "A-न्याय"… न्याय का वज़ूद अब अन्याय पर आधारित और उसी से निर्देशित है… न्याय अब विधि, तर्क, साक्ष्य और लोकशक्ति नहीं देखता, बल्कि व्यक्तित्व, कृतित्व, शोहरत, ताकत, वजन, कद और धनशक्ति मोहताज़ हो चला है… शोहरत और ताकत के मज़बूत फ्रेम में जकड़े दौलत के चकाचौंध दर्पण में वस्तुत: अन्याय ही न्याय के रूप में प्रतिबिंबित है… अपनी मज़बूत निगाहों से समूचे लोकतंत्र को घूरता न्याय अब अँधा तो नहीं है लेकिन बेहया, ढीठ, क्रूर तथा अवसर-परस्त और व्यक्तिवादी बन चुका है… ऊंचे लोगों की ऊँची पसंद वाला आधुनिक न्याय धनकुबेरों के लिए ब्रह्मास्त्र और निर्बल गरीबों के लिए स्वयं महादण्ड बन चुका है… अब ज़रूरत तो न्याय को फिर से अँधा करने की है… #संतासुर
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