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Sunday, November 15, 2015

➽ सड़ती हुई बदबू करती कांग्रेस की लाश का निस्तारण

                       कर्णाटक में हिन्दू कट्टरपंथियों द्वारा टीपू जयन्ती के पहली बार हो रहे सरकारी आयोजन का हिंसक विरोध करना पूर्णतया निंदनीय कृत्य है… अनावश्यक और अराजकतापूर्ण हिंसा हिंदुत्व का मूल तत्व कभी नहीं रहा… सरकार को ऐसे तत्वों से पूर्ण सख्ती से निपटना चाहिए… इसके बाद एक यक्ष प्रश्न उठता है कि टीपू सुलतान का जन्म 20 नवम्बर 1750 को हुआ था… सरकारों द्वारा किसी महापुरुष की या तो सालाना जयन्ती मनाई जाती है, अथवा रजत जयन्ती, स्वर्ण जयन्ती, हीरक जयन्ती इत्यादि मनाई जाती हैं… लेकिन कर्णाटक की परम सेक्युलर कांग्रेस सरकार द्वारा ये अचानक टीपू सुलतान की 265वीं जयंती मनाने के पीछे कर्णाटक सरकार का कौन सा उद्देश्य निहित है…? यह वही सेक्युलर कर्णाटक सरकार है जिसके उत्तम सुशासन में महान वामपंथी बुद्धिजीवी और कन्नड़ विद्वान् प्रो. एमएम कालबुर्गी की हत्या हुई… 

                    साम्प्रदायिक और जातीय ध्रुवीकरण कांग्रेस की ही ईज़ाद की गई कुर्सी-पकड़ विधि है, जिसे कालांतर में अन्य दलों ने भी अपना लिया… ब्राह्मण, दलित और मुसलमान कांग्रेस के लम्बे अरसे तक ध्रुवीकृत वोट बैंक रहे हैं… चाहे राजीव गांधी के शासनकाल में शाहबानो के मामले में कट्टरपंथियों की सलाह पर महज मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए उच्चतम न्यायालय के सर्वोचित निर्णय को बदलना रहा हो, जिसमें आरिफ मोहम्मद खान उदारवादी जैसे नेता को दरकिनार कर असहाय मुस्लिम महिलाओं के हितों को वोटों के लिए कुर्बान कर दिया गया… चाहे राजीव गांधी के ही शासनकाल में कुटिल वीपी सिंह की सलाह पर राम जन्मभूमि का ताला खोलकर हिन्दू वोटबैंक को रिझाना रहा हो… 

                   तभी उसके कुछ समय बाद ही सत्तालोभी कुटिल वीपी सिंह ने बोफोर्स बवण्डर के सहारे पीएम बनकर मण्डल का जातीय कार्ड खेल दिया… आज शरद यादव, नितीश कुमार, लालू यादव, मुलायम सिंह आदि जातीय वोटबैंक आधारित सत्ता गिरोह कोई समाजवाद नहीं अपितु मण्डल की देन हैं… फिलहाल तो, सर्वसुखकारक सत्ता की अभिलाषा जातीयता उन्मूलन की बजाय इस जातीय ध्रुवीकरण को उत्तरोत्तर मज़बूत करेगी… इससे उपजा जातीय-गौरव और जातीय-पहचान का संघर्ष भविष्य में वर्ग-संघर्ष की ओर उन्मुख है… वोट-बैंकों को साधने की अदम्य अभिलाषा से सत्ता दलों द्वारा हर जाति-धर्म-वर्ग-समुदाय-क्षेत्र के नायकों को ढूंढ-ढूंढ कर महापुरुष और राष्ट्रनायक के रूप में महिमामंडित किये जाने और सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की अंधी होड़ मची है… चुनावी सभाओं में सैम पित्रोदा अपनी जाति बताते हैं, तो वोटबैंक आधारित जातीय सम्मेलनों के पोस्टरों में गांधी जी, शिवाजी, सरदार पटेल, डा० अम्बेडकर, डा० राजेन्द्र प्रसाद, परशुराम, महाराणा प्रताप वगैरह के चित्र तथा उल्लेख होते हैं…  

                      नतीजे के तौर पर विखण्डित जनतादल के भाजपा बने टुकड़े ने अपनी अस्तित्व रक्षा और पैर जमाने के लिए के लिए राममंदिर के नाम पर हिन्दू कार्ड तैयार करने का तत्कालीन सफल प्रयास किया…  फिर जब जनता ने यूपीए को चुना तो देश का अतिशिक्षित बेहया मौनी गुलाम लालकिले से घोषणा करता है कि देश के प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है… आज भी देश का आम हिन्दू और मुसलमान रोज़ी-रोटी के लिए मिलकर जूझ रहा है, उसे ना विश्व हिन्दू परिषद से मतलब है और ना बग़दादी या ओवैसी को सुनने की फुर्सत… लेकिन कांग्रेस, उसकी छ: दशकों से पोषित वामपंथी रखैलें और क्षेत्रीय दलों के रूप में कांग्रेस की नाज़ायज औलादें सेक्युलरिज़्म के नाम पर हिन्दुओं और मुसलमानों का ही नहीं अपितु धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता, खानपान आदि अधिकाधिक आधारों पर ध्रुवीकरण करने में बेशर्मी से मशगूल हैं… इन सेक्युलर दलों का हरसंभव प्रयास है कि हर छोटी-बड़ी बात पर मुल्क के 25 करोड़ किन्तु अल्पसंख्यक मुसलमानों को हमेशा असुरक्षा का भय दिखाते रहो, उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा से दूर रखकर मज़हबी कर्मकाण्डों में संलग्न रखो… उन्हें अहसास कराओ कि अगर ये सेक्युलर दल ना होते तो भयानक-क्रूर-राक्षस हिन्दू लोग इन 25 करोड़ को बिना पानी के निगल जाते…   

                          नेहरू परिवार को महिमामण्डित करने के अलावा कांग्रेस ने अपने दूसरे राष्ट्रनायकों के साथ सदैव सौतेला व्यवहार किया… महात्मा गांधी को भले कांग्रेस ने गांधी उपनाम की मज़बूरीवश ढोया हो और डा० अम्बेडकर को दलित वोटबैंक के लालचवश, वरना डा० राजेन्द्र प्रसाद, राधाकृष्णन, सरदार पटेल, अबुल कलाम आज़ाद, लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारीलाल नंदा, नरसिम्हाराव, इत्यादि दर्ज़नों राष्ट्रनायक सिर्फ़ कांग्रेसी साबित करने के लिए याद किये गए… कांग्रेस ने सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे राष्ट्र भक्तों के साथ सदैव अन्याय किया… भारतरत्न जैसा पुरस्कार कांग्रेस की जागीर और नेहरू खानदान की बपौती बना दिया गया… पद्म से लेकर साहित्य और कला के क्षेत्र में सभी पुरस्कारों में कांग्रेस के वफादारों और दरबारियों को उपकृत किया गया… यहां तक कि कांग्रेस में असहमति के सुर उठाने वाले अथवा नेहरू परिवार की सत्तापोशी में ख़तरा पैदा किये जाने की सम्भावना वाले तमाम कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी नेताओं का राजनीतिक क़त्ल भी कांग्रेस की देन है… 

               देश में पहली बार इमरजेंसी लगाकर असहमतियों और विरोधियों सहित आम जनता का हर स्तर पर दमन कांग्रेस का एक असफल हिटलरी प्रयोग था… बिगड़ैल शहज़ादे संजय गांधी की छवि एक कट्टर हिंदूवादी और दमनकारी तानाशाह की रही है… ज़बरन और अविवाहतों तक की नसबंदी का तुगलकी फ़रमान सत्ता के लिए सदैव ख़तरा रहे ग़रीब अभावग्रस्त वोटरों की संख्या नियंत्रित करने का अभिनव कांग्रेसी प्रयोग था… चुनावों में क्षेत्रीय अपराधियों से मदद लेकर राजनीति के अपराधीकरण का बिस्मिल्ला भी कांग्रेस द्वारा ही किया गया… चुनावों में साड़ी, बिंदी, चूड़ी, दारू, पैसे इत्यादि का वितरण हो या बूथकैप्चरिंग से लेकर फ़र्ज़ी वोटिंग और मतपेटियां बदलने का काम हो, यह सब कांग्रेस की ईज़ाद है… अपने हितों के लिए विरोधियों के दमन और चुनाव जीतने के लिए पुलिस-प्रशासन का दुरुपयोग कांग्रेस द्वारा अंग्रेजों की परम्परा को मज़बूती से अपनाया गया…

                    नेहरू की कृपा से यूएनओ समर्पित पाक अधिकृत काश्मीर का रिस्ता घाव हो, धोखेबाज़ चीन से मिली हार हो या लिट्टे द्वारा भारतीय पीएम की नृशंश हत्या हो, या सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता हो या रूस-अमेरिका की मौकापरस्ती हो -- सभी अवसरों पर कांग्रेस की लचर, बचाव और आत्मसमर्पण वाली विदेशनीति स्पष्ट परिलक्षित होती है… बांग्लादेश जन्म और पाकिस्तान विजय का असली श्रेय तो हमारी उस बहादुर सेना को है जो कांग्रेसी शासन के अपार भ्रष्टाचार, राष्ट्र-सुरक्षा के प्रति अनिर्णयों और उपेक्षा तथा रक्षा घोटालों-कमीशनखोरी के बावज़ूद जीतने का हौसला रखती है… ध्यान रहे किसी राजनेता अथवा नौकरशाह का पुत्र कभी सैनिक नहीं बनता… 

                   गैर-कांग्रेसी राज्यपालों और राज्य-सरकारों को इच्छानुसार बर्खास्त करने अथवा तख्ता-पलट करवाने की परम्परा कुटिल सत्ता-लोलुप कांग्रेस की आतंरिक नीति रही है… चुनाव के पूर्व पुलिस-प्रशासन में मनमाफिक फेरबदल करना, सीबीआई, आईबी वगैरह का उत्पीड़नात्मक दुरुपयोग करना कांग्रेस की परम्परा रही है… चुनाव आयोग को अपनी मुट्ठी में रखना कांग्रेस ने टीएन शेषन के आने के पूर्व तक निर्बाध जारी रखा… जनलोकपाल जैसे जनहितैषी मुद्दे को कई दशकों तक लंबित रखना भ्रष्ट कांग्रेस की शंकाएं और भय स्वत: साबित करता है…

                       भाषा, शिक्षा, चिकित्सा-स्वास्थ्य और खेल के क्षेत्र में भी कांग्रेस ने खूब खेल किये… अंग्रेज़ी को क्षेत्रीय भाषाओँ और राष्ट्रभाषा के मुकाबले तरज़ीह दी गयी, ताकि देश की सामान्य ग़रीब आबादी अंग्रेज़ी-शिक्षित अभिजात्य वर्ग के लिए कभी ख़तरा ना बन पाये… स्वास्थ्य-चिकित्सा के क्षेत्र में भी आयुर्वेद, यूनानी, प्राकृतिक तथा पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों को उपेक्षित करने से देश की अधिकाँश जनता आज भी स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त है… अंग्रेज़ी और यूरोपियन शैली परस्त नेहरू, कांग्रेस और उनके वारिसों ने शिक्षा, विधि-कानून, पुलिस, प्रशासन समेत लगभग सभी क्षेत्रों में आधिपत्यवादी अंग्रेजों की व्यवस्थाओं को बहाल रखा… देशी लोक कलाओं-कलाकारों को लगातार उपेक्षित और बेरोज़गार करके भारतीय संगीत-कला को सिनेमा और टीवी जैसे पूंजीवादी और भ्रमोत्पादक माध्यमों के हवाले कर दिया गया… देशी खेलों-खिलाड़ियों को उपेक्षित और बेरोज़गार करके क्रिकेट जैसे अभिजात्य खेल को पाला-पोसा गया… भ्रष्ट गैर-खिलाड़ी कांग्रेसी चाटुकारों को क्रिकेट समेत सभी खेलों के संघों का मठाधीश बनाया गया… 

                       कुर्सी की अदम्य अभिलाषा से ही अंग्रेजों से भी बढ़-चढ़कर कांग्रेसियों द्वारा सामाजिक ध्रुवीकरण को अधिकतम मज़बूत किया गया… कुर्सी की अदम्य अभिलाषा और उससे मिलने वाली असीमित ताकत ने भ्रष्टाचार को भारतीय राजनीति का लगभग स्वीकृत मूल तत्व बना दिया… नेहरूकाल में शुरू हुए जीप-घोटाले से लेकर केंद्र और राज्यों में अरबों-खरबों रुपये के हज़ारों छोटे-बड़े घोटाले आज कांग्रेस की कलंककथा को विस्तारित कर रहे हैं… अकेले यूपीए के परम ईमानदार पीएम के शासनकाल में हुए दर्ज़नों घोटाले कांग्रेसी गिरोह की लूटकथा को लम्बा करने के लिए काफ़ी हैं… कांग्रेस सदैव मंहगाई का पर्याय रही है… चुनावों में उद्योगपतियों से कालाधन लेकर बाद में उन्हें लूटने की छूट देना कांग्रेस का शग़ल रहा है… देश-विदेश में मौजूद भारतीय बेईमान पूँजीपतियों, भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों का अकूत कालाधन छः दशकों के कांग्रेसी शासन की देन है… 

                    चुनांचे अंग्रेजों के दो सौ सालों से कहीं ज्यादा देश को कांग्रेस ने महज़ छः दशकों में लूटा और लुटवाया… और तो और नरसिम्हाराव और यूपीए शासनकाल में कांग्रेस ने अपने प्रबुद्ध पूर्वज नेहरू की आर्थिक नीतियों को भी बिलकुल उलट दिया… आईएमएफ और वर्ल्डबैंक के इशारों पर उसके दूत रहे तथाकथित पूंजीवाद समर्थक अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह पहले वित्तमंत्री और फिर प्रधानमंत्री के तौर पर देश की अर्थव्यवस्था के नियंता बना दिए गए… सार्वजनिक उपक्रमों को मनचाही कंपनियों को कौड़ियों के दाम बेंचने का उपकार-खेल शुरू हो गया… ग़रीब जनता को मंहगाई और बेरोज़गारी से निजात दिलाने की बजाय मुफ़्तख़ोरी और कर्जमाफ़ी जैसी लुभावने छल शुरू किये गए… बाद में कांग्रेस की आर्थिक नीतियों को भाजपा के अर्थ-धुरंधरों ने भी जारी रखा…

                       इस देश का हिन्दू-मुसलमान सैकड़ों सालों से साथ-साथ जीता-रहता आया है, तबसे जबसे कि साम्यवाद, सेक्युलरिज़्म, समाजवाद, प्रगतिशील आदि शब्दों का वर्तमान आविष्कार भी नहीं हुआ था… 1857 की ग़दर हो या उसके पूर्व का इतिहास हो, मुल्क में हिन्दू-मुसलमान जैसा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण नगरों-गाँवों में कहीं नहीं था… दोनों कौमें सारे त्यौहार हंसी-ख़ुशी बिना तनाव के मनातीं थीं… मज़ारों-मेलों-नाटक-रामलीला में दोनों बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे… देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कांग्रेस के वज़ूद में आने के बाद ही बढ़ा… नेहरू-जिन्ना की महत्वाकांक्षा भरी अघोषित मिलीभगत ने पहली बार साम्प्रदायिक आधार पर देश का विभाजन करवाया… देश में असम, बंगाल, यूपी, बिहार, गुजरात वगैरह में सबसे ज्यादा और भीषणतम दंगे कांग्रेस के ही शासन काल में प्रायोजित हुए… 1984 के निर्मम कांग्रेस बनाम सिख दंगे हों या भोपाल गैस काण्ड, जिसमें रातोरात सीएम अर्जुन सिंह और भोपाल जिला कलेक्टर ने अपराधी एंडरसन को सुरक्षा देकर देश से निकाला… हर इलेक्शन के पहले शाही इमामों, दरगाहों, चर्चों, गुरुद्वारों, मंदिरों, शंकराचार्यों आदि धार्मिक नेताओं से आशीर्वाद और समर्थन लेना कांग्रेस का ही शुरू किया गया कर्मकाण्ड है… 

                 भारत में आतंकवाद, परिवारवादी भ्रष्ट लूटनीति, साम्प्रदायिक-जातीय ध्रुवीकरण में कांग्रेस की वही भूमिका है जो वैश्विक आतंकवाद के मामले में स्वार्थी धूर्तराष्ट्र अमेरिका की है… अच्छे से अच्छा सुस्वाद-पौष्टिक भोजन भी एक अवधि उपरान्त बासी-बदबूदार सड़ांध के साथ जानलेवा बन जाता है… रघुवंश से लेकर गुप्तवंश, मौर्यवंश, मुगलवंश, वैश्विक अंग्रेजी हुकूमत तक और हड़प्पा, यूनान, मिस्त्र, रोमन, बेबीलोन से लेकर चीनी सभ्यता तक सभी का सामयिक उद्भव और पराभव हुआ है… दुनिया का कोई संगठन, संघ अथवा संस्था सदैव पतित-पावन, जनोपयोगी और निरापद नहीं रह पाते… तो कांग्रेस भी अब 129 वर्षों की जर्जर बूढी हो चुकी है जो भारत जैसे विशाल देश की बात छोड़िये, स्वयं अपनी देखभाल और ज़िम्मेदारी नहीं निभा सकती है… 

                    सच तो यह है कि कांग्रेस तो स्वयं कांग्रेस-पोषित भिंडरावाले के कारण इंदिरा जी हत्या के साथ ही खत्म हो चुकी है… बिहार चुनाव के पश्चात् सत्ता-अफ़ीम की लती कांग्रेस नितीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन के अधीन एक बहुराज्यीय क्षेत्रीय दल में बदल चुकी है… अब तो कांग्रेस की लाश को इसके पुराने पापी भक्त लोग अपने निजी स्वार्थ में ज़िंदा रखे हैं… इस सड़ती हुई बदबू करती कांग्रेस की लाश का येनकेन प्रकारेण निस्तारण करना आम भारतीय अवाम का अहम फ़र्ज़ है, वर्ना इसका संक्रमण पूरे देश के लिए राजनीतिक गैंग्रीन की महामारी बनकर इस प्राचीन सहिष्णु बहुरंगी सांस्कृतिक राष्ट्र को अंत में पुन: अंगभंग करवा देगा… अब मुल्क़ की लाचार-पीड़ित जनता के पास अंतिम मज़बूरी में कांग्रेस को पुन: माफ़ नहीं बल्कि समूल साफ़ करने का अहम राष्ट्रीय-दायित्व है… #‎संतासुर‬




#‎संतासुर‬

2 comments:

  1. Replies
    1. Sir, but that is the ultimate truth as far I visualize the Indian Politics and its implications all around... Thanks & regards...

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