"कच्ची दारू कच्चा वोट,
पक्की दारू पक्का वोट,
मुर्गा-दारू घर का वोट..."
उक्त नारा है एक यूपी के मलिहाबाद (लखनऊ) के एक गांव का... कमोबेश यही हाल पूरे यूपी के सभी गाँवों का है, जहाँ पंचायतीराज व्यवस्था के अंतर्गत ग्राम-प्रधान के चुनावों की प्रक्रिया चल रही है... गाँवों में प्रधान पद के प्रत्याशियों द्वारा उदारतापूर्वक थैलियों का मुंह मतदाताओं के लिए खोल दिया गया है... आम लोगों के लिए देशी दारू बह रही है, तो ख़ास के लिए विदेशी मदिरा बँट रही है... ग्राम-प्रधानी के प्रत्याशियों के दरवाजे विगत दो हफ़्तों से हलवाई जुटे हैं... सुबह से तरह-तरह के गरमागरम पकौड़ों, जलेबियों, चाय इत्यादि के द्वारा मतदाताओं का कलावा हो रहा है... कहीं दोपहर के भोजन की व्यवस्था है तो कोई रात के भोजन के न्योते बाँट रहा है... मनोरंजन के भी तमाम इंतज़ामात हैं...
रायबरेली जिले के एक गाँव में तो निवर्तमान प्रधान ने कई दलित परिवारों को कमरा बनवाने के लिए चुपचाप एक-एक ट्रॉली ईंट के पैसे बाँट दिए... यही नहीं दो दर्जन वोटों वाले एक परिवार को एक लाख रुपये तक दिए गए... सभी जगह बाकी आम वोटरों को दारू-भोजन, उपहार, मोबाइल, पेट्रोल-डीज़ल, साड़ी-कपड़े और वोट की कीमत के अनुसार नक़द धनराशि देकर रिझाया जा रहा है... ज़मीन-पट्टा देने, कोटा-परमिट दिलवाने, पेंशन दिलवाने अथवा चकबंदी में मोटा लाभ दिलवाने के वादे भी चल रहे हैं... जाति-धर्म, रिश्तेदारियों, पुराने अहसानों वग़ैरह की कटिया से वोटों को खींचने की हर मुमकिन कोशिशें ज़ारी हैं... मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली से लेकर गुजरात में रोटी कमा रहे वोटरों को वोटिंग लिए सुविधापूर्वक ट्रेन, बस, टैक्सी से मुफ़्त लाने ले जाने के समुचित प्रबंध हैं... मेरे लखनऊ निवासी मित्र के पारिवारिक वोटों के लिए उनके पास ऑफ़िस से उनके घर तक पांच-पांच प्रत्याशी चरण-वंदन के लिए कइयों बार आ चुके हैं...
सवाल यह कौंधता है कि आख़िर ग्राम-प्रधान का पद कितना उपजाऊ हो गया है...? एटा निवासी मेरे एक मित्र ने बताया कि उनके गाँव में ग्राम-प्रधान (दलित आरक्षित) चुनाव में कुल 28 दलित प्रत्याशी खड़े हैं... ग्राम-सभा के धोबी-जाति के कुल पाँच परिवारों से तीन उमीदवार हैं... कुल तेरह जाटव परिवारों से आठ प्रत्याशी हैं... आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि ग्राम-प्रधान पद में ज़रूर कुछ ऐसी तासीर है कि पड़ोसी अपने पड़ोसी से, दोस्त अपने दोस्त से, रिश्तेदार अपने रिश्तेदार से और यहां तक कि परिवारजन अपने परिवारजनों से दो-दो हाथ करने पर आमादा है... लोकतंत्र के छाते तले हिंसक-झड़पों, मारपीट, लाठी-गोली चलने से लेकर जानलेवा हमलों, वारदातों की श्रृंखला है और चुनावों के बहुत दिनों बाद तक यह हिंसक चुनावी हिसाब-किताब ज़ारी रहेगा...
लोकतंत्र के खेत में ग्राम-प्रधान जैसा वृक्ष अति फलदायी बन चुका है... प्रधानों की हैसियत अब साईकिल से सफ़ारी-स्कार्पियो, भव्य प्रासाद और अकूत चल-अचल संपत्ति की हो चली है... ग्राम-विकास परियोजनाओं, जनकल्याणकारी योजनाओं, मनरेगा, ग्रामसभा की प्राकृतिक सम्पदा, राजनीतिक दलाली तथा ब्लॉक-प्रमुख के चुनाव में मिलने वाली वोट की भारी कीमत से कमाई के अलावा प्रधान की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत भी इस गलाकाटू संघर्ष का मुख्य आकर्षण है... उधर नगर पंचायत चुनाव जीत चुके प्रत्याशी अपनी कीमत वसूलने में मशग़ूल हैं, जहाँ नगर पंचायत अध्यक्ष हेतु एक वोट के बदले आवश्यकतानुसार एक करोड़ या इससे अधिक नक़द और एक एसयूवी तक चलती है... पंचायतीराज व्यवस्था हमारे लोकतंत्र की मूल इकाई ग्रामसभा तक को भ्रष्टाचार और अवसरवाद के जाल में निरुद्ध कर चुकी है... बाकी लोकतंत्र का हाल सर्वविदित है...
यक्षप्रश्न है कि हमारा महान राष्ट्रीय धर्मग्रन्थ "संविधान" कितना पवित्र, समग्र, सम्पूर्ण, निरापद और प्रभावशाली रह गया है कि उससे प्रतिपादित, संचालित और नियंत्रित सम्पूर्ण लोकतान्त्रिक व्यवस्था आमूल-चूल अयोग्य, भ्रष्ट-लालची, खुदगर्ज़ इंसानी लंगूरों के हवाले हो चुकी है... सिर्फ़ एक वोट का अधिकार रखने वाली आम जनता इन धूर्त-लम्पट लंगूरों की लूट-खसोट और राष्ट्र का विध्वंश देखने को मज़बूर है...
लूटा लूटा... लूटे की आज़ादी बा,
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| #संतासुर |

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