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Thursday, June 18, 2015

➽ फिर तो काफ़िर तो काफ़िर, मोमिन भी काफ़िर…

वेदों में एकेश्वरवाद (तौहीद) स्पष्ट है, अर्थात ईश्वर एक है… तो उसके बाद प्रवर्तित सभी मज़हब अपने एकेश्वरवाद को क्या वेदों की नक़ल या वैदिक धर्म का ही हिस्सा मानेंगे…? वेदों में वर्णित जगत का एकमात्र कर्ता-धर्ता ईश्वर सर्वव्यापक, सर्वत्र, सर्वशक्तिमान, निराकार, निर्विकार, अजन्मा, अविनाशी, न्यायकारी, दयालु, और सच्चिदानंदस्वरुप है… किंचित हेराफेरी के साथ इस्लाम और ईसाइयत का ईश्वर भी तो ऐसा ही मान्य है… ईश्वर के प्रति अपेक्षित आसक्ति, समर्पण, श्रद्धा, भक्ति, भाव, सम्मान, स्मरण, गुणगान वगैरह के निर्देश तो अन्य मज़हबों में भी वैदिक धर्म जैसे ही वर्णित हैं… फिर तो काफ़िर तो काफ़िर, मोमिन भी काफ़िर… 

वेदों में एकेश्वरवाद (तौहीद) अर्थात एक ईश्वर होने के प्रमाण --

ऋग्वेद 6/51/16 - हे मनुष्य ! जो एक ही सब मनुष्यों का ठीक ठीक देखने वाला सर्वज्ञ सुखों की वर्षा करने वाले कर्म व ज्ञान वाला सर्वशक्तिमान सबका स्वामी हैं, तू सदा उसी की स्तुति कर।  

ऋग्वेद 8/1/1 - हे मित्रों तुम किसी अन्य की विशेष स्तुति अर्थात प्रार्थना उपासना न करो और इस प्रकार अन्यों की स्तुति करके मत दुःख उठाओं। सदा एकांत में और मिलकर किये हुए यज्ञों में सुख, शांति और आनंद की वर्षं करने वाले एक परमेश्वर की ही स्तुति करो और बार बार उसी के स्तुति वचनों का उच्चारण करो। 

ऋग्वेद 1/164/46 में एक ईश्वर होने का महान सन्देश “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” हैं। विद्वान ज्ञानी लोग एक ही सत्यस्वरूप परमेश्वर को विविध गुणों को प्रकट करने के लिए इन्द्र, मित्र,वरुण आदि अनेक नामों से पुकारते हैं। परम ऐश्वर्य संपन्न होने से परमेश्वर को इन्द्र, सबका स्नेही होने से मित्र, सर्वश्रेष्ठ और अज्ञान व अन्धकार निवारक होने से वरुण, ज्ञान स्वरुप और सबका अग्रणी नेता होने से अग्नि, सबका नियामक होने से यम, आकाश,जीवादी में अन्तर्यामिन रूप में व्यापक होने से मातरिश्वा आदि नामों से उस एक की ही स्तुति करते हैं। सामवेद मंत्र 259 में सायण आचार्य इस कथन की पुष्टि करते हैं। 

ऋग्वेद 6/22/1 - जो परमेश्वर सब मनुष्यों का एक ही पूजनीय हैं, उसकी इन वाणियों से चारों ओर से प्रेमपूर्वक पूजा कर। 

ऋग्वेद 10/72/2 - वह जगतकर्ता परमेश्वर विविध मनों का स्वामी, आकाश के तुल्य व्यापक, संसार का धारण करने वाला, विशेष रूप से सूर्य चन्द्र तथा लोक लोकान्तरों का धारण ओर पोषण करने वाला, अत्यंत उत्कृष्ट ओर सर्वज्ञ हैं, जिस परमेश्वर के विषय में विद्वान् कहते हैं की वह सात इन्द्रियों से परे एक ही हैं और जिस परमेश्वर के आश्रय में उन इन्द्रियादी के अभिलाषित सब भोग्य पदार्थ उस प्रभु की प्रेरक शक्ति से भली प्रकार हर्ष के कारण बनते हैं। 

ऋग्वेद 10/72/3 - जो परमेश्वर हमारा पालक हैं, उत्पादक हैं और जो विशेष रूप से हमारा धारण करने वाला और सब स्थानों लोकों और उत्पन्न पदार्थों को जानता हैं, जो सब देवों- इन्द्र , मित्र, वरुण, अग्नि, यम इत्यादि से नाम को प्रधानतया धारण करने वाला एक ही देव हैं। उस अच्छी प्रकार से जानने योग्य परमेश्वर की ओर ही अन्य सब लोक ओर प्राणी गति कर रहे हैं। 

ऋग्वेद 10/72/6 - प्रकृति ओर उसके परमाणुओं को सबसे पूर्व धारण करने वाला वही एक परमेश्वर हैं। इस अज-प्रकृति, सत्व या प्रधान की नाभि में एक ब्रहम तत्व ही ऊपर अधिष्ठाता रूप में विराजमान हैं, जिसके आधार पर सब लोक स्थित हैं, जो सारे जगत का संचालक ओर अध्यक्ष हैं। 

ऋग्वेद के 10वें मंडल के अतिरिक्त भी अन्य मंडलों में एकेश्वरवाद के अनेक प्रमाण हैं जैसे --ऋग्वेद 8/25/16 – यह प्रजाओं का स्वामी एक ही हैं। वह एक ही संसार का स्वामी सब प्रजाओं का ठीक ठीक निरिक्षण करता हैं। सब कुछ जानता हैं। 

ऋग्वेद 8/1/27 – जो परमेश्वर एक, अत्यंत आश्चर्यजनक, महान और अपने व्रतों के कारण अति तेजस्वी और दुष्टों के लिए भयंकर हैं उसी का ध्यान सबको करना चाहिए। 

ऋग्वेद 1/100/7 – परमेश्वर को सब करुणापूर्ण शुभ कर्मों का एकमात्र स्वामी बताया गया हैं। 

ऋग्वेद 1/54/14 - जिस परमेश्वर के आकाश और पृथ्वी, समुद्र और अन्य लोक-लोकान्तर अंत नहीं पा सकते वह सब में ओत-प्रोत हैं, ऐसा वह परमेश्वर एक ही हैं। 

सामवेद 372 और अथर्ववेद 7/21/1 – हे मनुष्यों! तुम सब सरल भाव और आत्मिक बल के साथ परमेश्वर की ओर उसका ध्यान- भजन के लिए आओ, जो एक ही मनुष्यों में अतिथि की तरह पूजनीय अथवा सर्वव्यापक हैं। वह सनातन- नित्य हैं और नए उत्पन्न पदार्थों के अन्दर भी व्याप रहा हैं। ज्ञान-कर्म-भक्ति के सब मार्ग उसकी और जाते हैं. वह निश्चय से एक ही हैं। 

ऋग्वेद 2/1/3 और 2/1/4 में परमात्मा को अग्नि के नाम से संबोधित करते हुए कहा गया हैं कि तू ही इन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा और ब्रह्मणस्पति हैं, तू ही वरुण, मित्र, अर्यमा आदि नामों से पुकारा जाता हैं। अर्थात परम ऐश्वर्य संपन्न होने से वही परमेश्वर इन्द्र, सर्वव्यापक होने से विष्णु, सबसे बड़ा होने से ब्रह्मा, ज्ञान स्वामी होने से वरुण, सबका स्नेही होने से मित्र और न्यायकारी होने से अर्यमा के नाम से याद किया जाता हैं। 

अथर्ववेद 13/4/5 – वही परमात्मा अर्यमा, वरुण, इन्द्र, महादेव, अग्नि,सूर्य, महायम इत्यादि नामों से पुकारा जाता हैं। वह एक परमात्मा ही नमस्कार करने योग्य हैं। 

इस प्रकार अनेक वैदिक मन्त्रों के प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं कि वेदों में एक ही ईश्वर का वर्णन हैं, जो उपासना करने योग्य हैं। भाई, इसलिए योग-भोग पर मत झगड़ो… इस ईश्वरीय दुनिया जो कुछ सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय हो उसको विवादित मत करो… उस एकमेव परमात्मा का सम्मान करो… #‎संतासुर‬  


#‎संतासुर‬

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