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Wednesday, October 7, 2015

➽ पितृपक्ष में अपने दिवंगत पूर्वजों के साथ

अज्ञात ईश्वरीय आदेश पर दुनिया भर में तमाम स्वयंभू इंसानी देवदूत बेगुनाह इंसानों को तड़पा-तड़पा कर बेरहमी से परलोक भेज रहे हैं… तो वहीँ हम पितृपक्ष में अपने दिवंगत पूर्वजों के साथ ही दुनिया भर के समस्त मरहूम लोगों को, जीव-जंतुओं, कीट-पतंगों तक को श्रद्धापूर्वक तर्पण कर रहे हैं… कुछेक मन्त्रों का अवलोकन करिये:

"देवसुरास्थता यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसा:।
पिशाचा गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तव: खगा:।।
जलेचरा भूनिलया वायवाधाराश्च जन्तव:।
प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दतेनाम्बुनाखिला:।।
नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिता:।
तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया।।
येડबान्धवा बान्धवा वा येડन्यजन्मनि बान्धवा:।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिण:।।"


"अर्थात, देवता, असुर, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध, कूष्माण्ड, वृक्षवर्ग, पक्षी, जलचर तथा थलचर जीव और वायु के आधार पर रहने वाले जीव-जंतु -- ये सभी मेरे दिए हुए जल से शीघ्र तृप्त हों। जो समस्त नरकों तथा वहाँ की यातनाओं में पड़े-पड़े दुःख भोग रहे हैं, उनको पुष्ट तथा शांत करने की इच्छा से जल देता हूँ। जो मेरे बंधु-बांधव ना रहे हों, जो इस जन्म में मेरे बंधु-बांधव रहे हों अथवा किसी दूसरे जन्म में मेरे बंधु-बांधव रहे हों -- वे सब तथा इनके अतिरिक्त भी जो मुझसे जल पाने की इच्छा रखते हों -- वे सभी मेरे द्वारा दिए हुए जल से तृप्त हों।"

"ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तम् देवर्षिपितृमानवा:।
तृपयन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय:।।
अतीतकुलकोटीनाम् सप्तद्वीपनिवासिनाम्।
आब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्।।
येડबान्धवा बान्धवा वा येડन्यजन्मनि बान्धवा:।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा।।"


"अर्थात,ब्रह्माजी से लेकर कीटों तक जितने भी जीव हैं, वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और माता एवं मातृ पक्ष से नाना आदि पितृगण -- ये सभी तृप्त हों। मेरे कुल की बीती हुई करोड़ों पीढ़ियों में उत्पन्न हुए जो-जो पितर ब्रह्मलोकपर्यन्त सातों द्वीपों (महाद्वीपों) के भीतर कहीं भी निवास करते हों, उनकी तृप्ति के लिए मेरा दिया हुआ यह तिल मिश्रित जल उन्हें प्राप्त हो। जो मेरे बंधु-बांधव न रहे हों, जो इस जन्म में या किसी दूसरे जन्म में मेरे बंधु-बांधव रहे हों, वे सभी मेरे दिए हुए जल से तृप्त हों।"


मुझे नहीं पता कि मरणेत्तर जीवन कैसा होता है? वास्तव में मेरे तर्पण से ये सभी दिवंगत जल पाकर तृप्त होते हैं या नहीं? लेकिन पितृपक्ष में 15 दिनों तक अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देकर कृतज्ञता व्यक्त करते हुए, उनके साथ ही विश्व के सभी इंसानी मृतकों और मृत ज्ञात-अज्ञात जीव जंतुओं को तर्पण करके सम्मान देते हुए मुझे स्वयं को आत्मिक और भावनात्मक शांति मिलती है… साथ ही गौरव होता है अपनी सनातन संस्कृति पर और इसकी वसुधैवकुटुंबकम तथा सर्वे भवन्तु सुखिन:जैसी अलौकिक भावनाओं पर… #‎संतासुर‬

#‎संतासुर‬

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